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मंगलवार, 7 जून 2011

डरी हुई सरकार का कायराना कारनामा

बाबा रामदेव और उनके समर्थकों पर दिल्ली में पुलिस कार्यवाही पर जसम का बयान

नई दिल्ली , ६ जून, २०११
४/५ जून की मध्यरात्री में यु.पी.ए. सरकार द्वारा योगगुरु रामदेव के आह्वान पर भ्रष्टाचार-विरोधी मुहीम में दूर-दराज़ से आए लोगों पर रात के अँधेरे में उन्हें सोते में औचक ही सरकारी दमन का शिकार बनाना एक डरी हुई सरकार का कायराना कारनामा है. इस घटना से सरकार ने यह सन्देश भी दिया है कि वह कारपोरेट हितों के खिलाफ असली या नकली किसी भी प्रतिरोध को झेल नहीं सकती. भ्रष्टाचार का सवाल सीधे -सीधे निजीकरण-उदारीकरण और खगोलीकरण की अमीरपरस्त-साम्राज्यपरस्त नीतियों पर चोट करता है. तमाम सत्ता की पार्टियां इस दलाल अर्थतंत्र का हिस्सा हैं, लिहाजा मुख्यधारा की राजनीति में मुख्य प्रतिपक्ष ने जो जगह छोडी है, उसे नागरिक समाज की शक्तियां और दूसरे जन-आन्दोलन भर सकते हैं. इन आन्दोलनों की तमाम कमियों कमजोरियों के बावजूद लोगों का इनके आह्वान पर जुटना स्वाभाविक है. ऐसे में सरकार इन पर हर कहीं दमन पर उतारू है.
रामदेव की राजनीतिक महत्वाकांक्षा, उनके द्वारा संघ परिवार के नेटवर्क का इस्तेमाल और संघ द्वारा उनके इस्तेमाल का अवसरवाद , खुद रामदेव के ट्रस्ट की परिसंपत्तियों के विवादित स्रोतों के बारे में शायद ही किसी सजग व्यक्ति को भ्रम हो. दिल्ली आने से पहले से ही सरकार के साथ उनका मोल-तोल जारी था. उन्होंने लोकपाल विधेयक में प्रधानमंत्री और जजों को जांच के दायरे में शामिल न किए जाने की मांग कर नागरिक समाज द्वारा प्रस्तावित विधेयक को कमज़ोर करने और सरकार को खुश करने की भी कोशिश की थी. हवाई अड्डे पर सरकार के कई मंत्रियों का उनसे मिलने पहुँचना , बालकृष्ण का आन्दोलन आगे न चलाने के वचन वाला पत्र , सभी कुछ सरकार और उनके बीच बहुविध लेन-देन और सौदेबाजी की तस्दीक करता है, लेकिन इसके बावजूद पुलिसिया दमन और आतंक को कहीं से भी जायज़ नहीं ठहराया जा सकता. जंतर मंतर पर भी लोगों के जमावड़े पर प्रतिबन्ध लगाकर सरकार ने अपने इरादे ज़ाहिर कर दिए हैं. यह दमन राजधानी में सिर्फ रामदेव पर नहीं रुकेगा, बल्कि किसी भी आन्दोलन , धरने और प्रदर्शन के दमन का रास्ता साफ़ हुआ है. शेष भारत में, आदिवासी इलाकों में, किसानों के आन्दोलनों पर, बड़ी देशी-विदेशी पूंजी के दोहन के खिलाफ यह दमन जारी ही है. दिल्ली इसका अपवाद नहीं बनी रह सकती.
लिहाजा इस घटना को अघोषित आपातकाल की एक कड़ी के रूप में ही देखना चाहिए और इसके दमनकारी अभिप्राय को नागरिक समाज को कम करके नहीं आंकना चाहिए. हम इस घटना की और इसकी ज़िम्मेदार केंद्र सरकार की घोर भर्त्सना करते हैं और आम नागरिक और बुद्धिजीवियों से भी इसके पुरजोर विरोध की अपील करते हैं.
(प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी )

गोरखपुर में 3 मई को मज़दूरों पर हुई फायरिंग और वहां जारी मज़दूर आन्दोलन के दमन पर मीडियाकर्मियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की तीन-सदस्यीय जांच टीम की रिपोर्ट

नई दिल्ली, 3 जून। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर शहर में 3 मई को एक कारखाने के मज़दूरों पर हुई फायरिंग की जांच करने वाले मीडियाकर्मियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के जांच दल ने वहां ज़िला प्रशासन और पुलिस की भूमिका पर सवाल खड़े करते हुए समस्त घटनाओं की उच्च स्तरीय न्यायिक जांच कराने की मांग की है।
इस जांच दल ने 19 से 21 मई तक गोरखपुर का दौरा करके और विभिन्न पक्षों से बात करने के बाद आज नई दिल्ली में अपनी जांच रिपोर्ट जारी की। इस जांच दल में दिल्ली के पत्रकार नागार्जुन सिंह, फिल्मकार चारु चन्द्र पाठक और कोलकाता के पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता सौरभ बनर्जी शामिल थे। तीन दिनों के दौरान जांच दल ने विभिन्न प्रशासनिक अधिकारियों, श्रम विभाग, स्थानीय सामाजिक संगठनों, राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों, श्रम संगठनों, मीडियाकर्मियों, श्रमिकों, श्रमिक नेताओं और प्रबुद्ध नागरिकों से मुलाकात करके इस पूरे घटनाक्रम की विस्तृत जांच की।
रिपोर्ट के अनुसार फायरिंग की घटना का तात्कालिक कारण यह था कि कई कारखानों के करीब 1500 मज़दूर 1 मई को आयोजित मज़दूर मांगपत्रक आंदोलन की रैली में शामिल होने के लिए दिल्ली चले गये थे जबकि कारखाना मालिकान इसका विरोध कर रहे थे। दिल्ली से लौटने पर 18 चुनिंदा श्रमिकों को निलंबित कर दिया गया। 3 मई को हथियारबंद लोग जब श्रमिक नेता प्रशांत को जबर्दस्ती फैक्टरी के अंदर ले जाने का प्रयास कर रहे थे तब श्रमिक आक्रोशित हुए और इसके विरोध तथा अपने बचाव में उन्होंने पथराव किया। इसके बाद फैक्टरी के अंदर से हुई फायरिंग में 19 मज़दूर और एक छात्रा घायल हो गये।
जांच टीम इस निष्कर्ष पर पहुंची कि 3 मई को हुई फायरिंग एक अलग-थलग घटना नहीं बल्कि गोरखपुर में दो वर्ष से मालिकों और मज़दूरों के बीच में चल रहे टकराव की ही परिणति है। पिछले लगभग दो वर्ष से मज़दूर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करते आ रहे हैं जो अब संगठित रूप ले चुका है। यह फैक्टरी प्रबंधन के लिए चिंता का सबब बन चुका है। श्रमिकों के प्रति प्रशासनिक दृष्टिकोण भी सहयोगात्मक नहीं है। जांच में यह बात मुख्य रूप से उभर कर आई कि श्रमिकों का पक्ष पूरी तरह नहीं सुना जा रहा है और प्रशासनिक स्तर पर उपेक्षा और बल प्रयोग से बात और बिगड़ रही है।
जांच टीम ने अपनी रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश शासन से मांग की है कि अंकुर उद्योग लि. में हुई फायरिंग की उच्च स्तरीय जांच करायी जानी चाहिए। टीम कमिश्नर द्वारा मजिस्ट्रेट जांच के आदेश को असंगत मानती है क्योंकि पूरे प्रकरण में प्रशासनिक भूमिका संदेह के दायरे में है। टीम की अन्य संस्तुतियों में फायरिंग के दोषी व्यक्तियों की गिरफ्तारी, श्रमिकों तथा उनके नेतृत्व से सौहार्दपूर्ण माहौल में वार्ता करके उनकी समस्याओं का समाधान करना, गोरखपुर औद्योगिक क्षेत्र की फैक्टरियों में श्रम कानूनों की वास्तविक तस्वीर सामने लाना और इनमें श्रम कानूनों के अनुपालन को सुनिश्चित कराना, पुलिस की भूमिका की जांच कराना और गोलीकांड में घायल लोगों को सरकार द्वारा उचित मुआवजा दिया जाना शामिल है।

- नागार्जुन सिंह, वरिष्ठ उप-सम्पादक, हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
फोनः 9953623417, ईमेलः दंहंतरनदंण्ेपदही/हउंपसण्बवउ
- सौरभ बनर्जी, फोनः 9811841341, ईमेलः ेवनतंअइंदमतरमम25/लंीववण्बवण्पद
- चारु चन्द्र पाठक, दिल्ली, फोनः 9818376996, ईमेलः बींतनबींदकतं1234/हउंपसण्बवउ