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शुक्रवार, 28 जून 2013

विकास के मौजूदा माडल से नहीं रूकेगी हिंसा: हिमांशु कुमार

भारतीय राजनीति की त्रासदी पर बोले हिमांशु कुमार
रामकृष्ण मणि त्रिपाठी स्मृति समारोह में व्याख्यान, स्मृति चर्चा और सांस्कृतिक कार्यक्रम
गोरखपुर। प्रसिद्ध गांधीवादी कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने कहा है कि विकास के मौजूदा माडल से हिंसा नहीं रूकेगी। भारतीय राजसत्ता के विकास का माडल यही है कि गरीब से उसकी जमीन, जंगल, पहाड, नदी सब छीनकर अमीर को सौंप दो। यही हुआ है इसलिए अशांति बढ रही है। उन्हांेंने कहा कि हमारा राजनीतिक ढांचा और सिस्टम गरीबों के जल, जंगल, जमीन और जीवन पर हमले को सपोर्ट करता है। इसलिए यह हिंसा से भरा है। इससे अहिंसा निकल ही नहीं सकती।
हिमाशु कुमार मंगलवार को पीपुल्स फोरम और राम कृष्ण त्रिपाठी मेमोरियल टस्ट के तत्वावधान में आयोजित राम कृष्ण मणि ़ित्रपाठी की पहली पुण्यतिथि पर आयोजित स्मृति समारोह में लोकतं़़त्र की ़़़़त्रासदी विषय पर बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि समाज का मतलब है उसमें रहने वाले सब बराबर हैं और उन्हें न्याय की गारंटी होगी। जिस समाज में बराबरी और न्याय नहीं है, वह समाज नहीं है। सच्चाई यही है कि देश के बहुसंख्य आदिवासियों, दलितो, किसानों और मजदूरों के हिस्से बराबरी और न्याय नहीं है। आदिवासियों के साथ सरकार का युद्ध चल रहा है। सरकार उन्हें विकास के लिए सबसे बडा खतरा मानती है। आदिवासी मानता है कि प्रकृति का कोई मालिक नहीं हो सकता। सरकार बंदूक के बलपर कहती है कि इसके मालिक टाटा, एस्सार, जिंदल हो सकते हैं। छत्तीसगढ सरकार ने 2005 में टाटा, एस्सार, जिंदल की कम्पनियों से एमओयू किए। इसके तत्तकाल बाद 5000 गुंडों और पांच हजार सुरक्षा बलों को आदिवासियों के गांव खाली कराने के लिए छोड़ दिया। इस अभियान को सलवा जुडूम नाम दिया गया। इन हमलावारों ने 650 गांवों में सैकड़ों बूढ़ों-बच्चों का कत्ल किया। सैकड़ों महिलाओं के साथ यौन दुव्र्यवहार व बलात्कार किया गया। इस हमले में साढ़े तीन लाख लोगांे को उनके घर, जमीन से खदेड़ दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने जब इसे गैरकानूनी और गैसंवैधानिक घोषित किया तब भी इसे सत्ता इसे संचालित करती रही।
उन्होंनें कहा कि आज भारतीय राज सत्ता यह कह रही है कि हमारे विकास के माडल को जो स्वीकार नहीं करता वह विकास विरोधी और राष्ट विरोधी है। नौ प्रतिशत की विकास दर पाने के लिए भारत के खनिज क्षेत्रों का दोहन जरूरी है। इसलिए आदिवासियों पर राज्य सत्ता दुश्मन देश की तरह हमलावर है। उन्होेंने गांधी को याद करते हुए कहा कि गांधी ने कहा कि देश ने यदि अंग्रेजो के विकास के माडल को स्वीकार किया तो उसे एक दिन अपने ही जनता से युद्ध करना होगा क्योंकि अंगेजी विकास माडल हिंसक विकास का माडल है। इससे पर्यावरण का भी विनाश होगा।
इस सत्र की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कथाकार एवं आलोचक प्रो रामदेव शुक्ल ने राम कष्ण मणि त्रिपाठी के एक लेख वियांड पालिटिक्स को याद करते हुए कहा कि इस लेख में आधुनिक विकास के स्रोत की शिनाख्त करते हुए कहा कि आधुनिक विकास का माडल विज्ञान, पूंजी और पालिटिक्स के सांठगांठ का माडल है जो लोकतंत्र और आमजन के विरूद्ध है।
इस सत्र का संचालन पीपुल्स फोरम के वरिष्ठ सदस्य मनोज कुमार सिंह ने किया। धन्यवाद ज्ञापन स्व रामकृष्ण मणि त्रिपाठी के पुत्र श्रीश मणि त्रिपाठी ने किया।
रामकृष्ण मणि का वीडियो इंटरव्यू दिखाया गया
समारोह की शुरूआत गोरखपुर फिल्म सोसाइटी और जन संस्कृति मंच के फिल्म समूह द्वारा निर्मित रामकृष्ण मणि त्रिपाठी के वीडियो इंटरव्यू का प्रदर्शन किया गया। 35 मिनट के इस वीडियो इंटरव्यू में रामकृष्ण मणि त्रिपाठी आजमगढ में अपने बचपन, इलाहाबाद में पढाई व शिक्षण तथा गोरखपुर में बिताए छह दशक के जीवन की चर्चा करते हुए इन शहरों के बदलते फिजां की बात करते हुए समाज के अराजनीतिक होते जाने पर चिंता जताते है। वह गंगा-जमुनी तहजीब की चर्चा करते हुए साम्प्रदायिक राजनीति के खिलाफ कस कर लोहा लेने के लिए निरन्तर आंदोलन की आवश्यकता जताते है। वह अपनी पंसदीदा पुस्तकों का जिक्र करते हुए एक स्थान पर कहते हैं कि मैने हमेशा उन पुस्तकों, सिनेमा को पढ़ना-देखाना पंसद किया जो स्थापित सिद्धान्तों पर सवाल करती है। इस वीडियों इंटरव्यू का निर्देेशन संजय जोशी ने किया है। उन्होंने बताया कि इस इंटरव्यू को 8 मई 2010 को उनके घर पर रिकार्ड किया गया था।

रामकृष्ण मणि जैसे विराट व्यक्तित्व का मित्र होना गौरवान्वित करता है-ओपी मालवीय
स्मृति समारोह के दूसरे सत्र में रामकृष्ण मणि त्रिपाठी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा हुई। इस सत्र के मुख्य वक्ता इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेजी के प्राध्यापक रहे ओपी मालवीय ने रामकृष्ण मणि को अभिन्न और आत्मीय मित्र के रूप में याद करते हुए कहा कि मुझे गर्व है कि उनके साथ काफी समय विताने का मौका मिला। उनका एक विशेष गुण हास-परिहास का था जिससे कम लोग परिचित है। बात करते-करते कब उनके मुंह से हंसी का फव्वारा छूट जाए पता नहीं चलता था। बाद के दिनों मे वह लगातार गंभीर होते चले गए और उनका अध्ययन व मनन गहरा होता है। श्री मालवीय ने स्व त्रिपाठी को रूसी उपन्यासों का विशेषज्ञ बताया। शहर के मशहूर चिकित्सक डा अजीज अहमद ने स्व मणि को ज्ञान का खजाना बताया और कहा कि दुनिया का कोई ऐसा विषय नहीं था जिसको जानने में उनकी रूचि न हो। उन्होंने कहा कि उनकी कमी इस शहर को हमेशा खलेगी। गोरखपुर विश्वविद्यालय के राजनीति विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो श्रीकाश मणि ने कहा कि स्व रामकृष्ण मणि कहा करते थे कि जो लोक के करीब न हो वह लोकतंत्र नहीं है। वह देश के लोकतंत्र के लगातार सिकुड़ते जाने पर चिंतित थे। इस सत्र में ओपी राय ने भी अपने विचार व्यक्त किए। इस सत्र का संचालन कर रहे डा चन्द्रभूषण अंकुर ने रामकृष्ण मणि की विलक्षण स्मृति का उल्लेख किया।



नाटक बयार और सूफी गायन ने लोगों का मन मोहा 
स्मृति समारोह के अंतिम सत्र में नई दिल्ली से आए अथक थियेटर ग्रपु के कलाकारों ने नाटक बयार का मंचन किया। रौनक खान निर्देशित इस नाटक में नाटकों में अभिनय की रूचि रखने वाले एक नौजवान की कहानी है जो गांव में आई नौटंकी मंडली के साथ घर छोड़कर भाग जाता है लेकिन नौटंकी मंडली बन जाती है और उसका संचालक अपनी पत्नी को छोड़कर भाग जाता है। यह नौजवान आखिर में परित्यक्ता स्त्री से विवाह कर लेता है लेकिन उसके अपनी जिंदगी चलाने के लिए मजदूरी करनी पड़ती है। नाटक की पटकथा रौनक खान ने ही लिखी थी। इस नाटक ने लोगों को खूब प्रभावित किया। इसके बाद कुशीनगर के कप्तानगंज कस्बे से आए असगर अली वारसी और उनके साथियों ने सूफी गीत, गजल और कव्वाली गायन किया। इसे सुनने के लिए देर रात तक श्रोता जमे रहे।

गांव छोड़ब नाहीं के साथ उठा पहले सलेमपुर फिल्म फेस्टिवल का पर्दा

गाड़ी लोहरदगा देख सलेमपुर के लोगों का याद आई अपनी बरहजिया ट्रेन
गांव छोड़ब नाहीं के साथ उठा पहले सलेमपुर फिल्म फेस्टिवल का पर्दा

बरहजिया ट्रेेन की याद दिलाने वाली डाक्यूमेंटरी गाडी लोहरदगा मेल के प्रदर्शन के साथ पहला सलेमपुर फिल्म फेस्टिवल शुक्रवार को शुरू हुआ। बापू महाविद्यालय के नवनिर्मित सभागार में आयोजित दो दिवसीय इस फिल्म फेस्टिवल का उद्घाटन रांची से आए फिल्मकार बीजू टोप्पो ने किया।
जन संस्कृति मंच की देवरिया इकाई और लोक तरंग फाउंडेशन ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित फिल्म फेस्टिवल के पहले दिन दो डाक्यूमेंटरी, एक वीडियो म्यूजिक और एक फीचर फिल्म का प्रदर्शन किया गया। सबसे पहले वीडियो म्यूजिक गांव छोड़ब नाहीं दिखाई गई। यह वीडियो म्यूजिक विकास के नाम पर किए जा रहे जबरन विस्थापन के खिलाफ आदिवासियों, मजदूरों के संघर्ष को सलाम करती है। इसमें आदिवासी, मजदूर और किसान संकल्प लेते हैं कि वे जल, जंगल, जमीन से बेदखल किए जाने के खिलाफ अपने संघर्ष को जारी रखेंगे और किसी भी कीमत पर अपने गांव, नदी, जंगल, जमीन को कार्पोरेट लूट का हिस्सा नहींे बनने देंगे। इसके बाद रांची से लोहरदगा के बीच मीटर गेज पर चलने वाली पैसेन्जर ट्रेन पर बनी डाक्यूमेंटरी गाड़ी लोहरदगा मेल दिखाई गई। नौ दशक से अधिक समय तक रांची और लोहरदगा के बीच गांवों के ग्रामीणों के लिए लाइफ लाइन यह टेªन 2003 में बंद हो गई थी। इस टेन में फिल्मकार मेघनाथ, बीजू टोप्पो के साथ संस्कृति कर्मियों ने यात्रा की। ट्रेन में यात्रा कर रहे संस्कृति कर्मीै इस टेन के महत्व और ग्रामीणों से रिश्ते को अपने गीतों में व्यक्त करते है। फिल्म के निर्माण के बारे में बीजू टोप्पो ने बताया कि इस डाक्यूमेंटरी को तीन दिन की शूटिंग में बनाया था।
डाक्यमेंटरी प्रतिरोध में झारखंड के रांची के निकट नगड़ी गांव में इंडियन इंस्टीच्यूट आफ मैनेजमेंट और विधि विश्वविद्यालय के लिए 277 एकड़ उपजाउ कृषि जमीन हडपने की कोशिश के खिलाफ किसानों, आदिवासियों के संघर्ष के दास्तान को बयां किया गया है। इस जमीन को वर्ष 1957 में अधिग्रहीत करने की कोशिश हुई थी जिसे किसानों ने अपने संघर्ष से विफल कर दिया था। इस फिल्म का भी निर्माण बीजू टोप्पो और मेघनाथ ने किया है। इस डाक्यूमेंटरी के बाद दर्शकों ने फिल्मकार बीजू टोप्पों से बातचीत भी की।
पहले दिन की आखिरी फिल्म  के रूप में वर्ष 1990 में बनी तपन सिन्हा की फीचर फिल्म एक डाक्टर की मौत दिखाई गई। यह फिल्म कुष्ठ रोग के इलाज की दवा विकसित कर रहे एक डाक्टर की कहानी है जिसे साथी डाक्टरों और नौकरशाही के उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है। उसकी खोज को दबा दिया जाता है और इसी रोग की दवा के अविष्कार का श्रेय दो अमरीकी वैज्ञानिकों को मिल  जाता है। इस सदमे से डाक्टर उबर नहीं पाता और वह अंत में विदेश जाकर काम करने के अनुरोध को स्वीकार कर लेता है। सरकारी तंत्र की पोल खोलती यह फिल्म पंकज कपूर के यादगार अभिनय के लिए आज भी याद की जाती है।

सत्ता द्वारा दबा दिए गए सच को सामने ला रही हैं डाक्यूमेंटरी-बीजू टोप्पो
फिल्म फेस्टिवल का उद्घाटन करते हुए रांची से आए फिल्मकार बीजू टोप्पो ने कहा कि आज झारखंड, उड़़ीसा, छत्तीसगढ सहित कई राज्यों में जल, जंगल, जमीन की कार्पोरेट लूट हो रही है। सरकार इस लूट में बराबर की साझीदार है। इसके खिलाफ आदिवासियों, किसानों के संघर्ष को मुख्य धारा का मीडिया, सिनेमा जगह देने को तैयार नहीं है। इस स्थिति में डाक्यूमेंटरी फिल्मकार सीमित साधनों में उत्पीडि़तों की आवाज और जमीनी सच को डाक्यूमेंटरी सिनेमा के जरिए देने की कोशिश कर रहे हैं। इस तरह के फिल्म फेस्टिवल सत्ता और कार्पोरेट द्वारा दबा दिए गए सच को दिखाने का महत्वपूर्ण मंच बन रहे है। जन संस्कृति मंच के फिल्म समूह द ग्रुप के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी ने कहा कि प्रतिरोध का सिनेमा की सबसे बडी ताकत जन सहयोग से इसका आयोजित होना है। जनता का सिनेमा, जनता के ही सहयोग से बन सकता है और उसको दिखाया जा सकता है। जन संस्कृति मंच के राष्टीय पार्षद अशोक चैधरी ने जिस देश ने ब्रिटिश साम्राज्यवादियों को बेमिसाल संघर्ष के जरिए खदेड़ दिया था उस देश की जनता को बताया जा रहा है कि अमरीकी संस्कृति ही हमारी उद्धारक है। प्रतिरोध का सिनेमा लूट की संस्कृति, रंगीन चमकती हुई दुनिया और इसके कारोबारियों के खिलाफ संघर्षशील जनता का मंच है। डाक्यूमेंटरी सिनेमा के निर्माण, उसको दिखाने के प्रयासों व दर्शकों के रिस्पांस पर रिसर्च कर रहीं मोनाश यूनिवर्सिटी आस्टेलिया की श्वेता किशोर ने कहा कि डाक्यूमेंटरी सिनेमा का छोटे कस्बों में दिखाने का काम बहुत महत्वपूर्ण है और मेरे लिए सलेमपुर जैसे स्थान पर फिल्म फेस्टिवल का आयोजन देखना एक विशिष्ट अनुभव है। उन्होंने कहा कि जब हम सिनेमा हाल मे फिल्म देखने जाते हैं तो  ग्राहक होते हैं लेकिन इस तरह के आयोजनों में दर्शक एक साझीदार के रूप में आते है। जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय सचिव मनोज कुमार सिंह ने प्रतिरोध के सिनेमा की यात्रा का विस्तार से जिक्र करते हुए कहा कि सलेमपुर फिल्म फेस्टिवल से हम प्रतिरोध के सिनेमा के तीसरे चरण में प्रवेश कर रहे है। इसके बाद सलेमपुर जैसे छोटे-छोटे कस्बों में इस तरह के आयोजनों का सिलसिला शुरू होगा। धन्यवाद ज्ञापन उद्भव मिश्र ने किया। उदघाटन सत्र का संचलान लोक तरंग फाउंडेशन ट्रस्ट के अध्यक्ष मिनहाज सोहग्रवी ने किया। उद्घाटन सत्र में उत्तराखंड मे बाढ, भूस्लखन से हुई त्रासदी में मारे गए लोगों को एक मिनट मौन रखकर श्रद्धाजंलि दी गई।

सलेमपुर फिल्म फेस्टिवल के दूसरे दिन पूर्वांचल के त्रासदी इंसेफेलाइटिस पर  गोरखुपर फिल्म सोसाइटी द्वारा बनायी गई डाक्यूमेंटरी खामोशी तथा चर्चित शायर तश्ना आलमी द्वारा लखनउ फिल्म सोसाइटी द्वारा बनायी गई डाक्यूमेंटरी अतश का प्रदर्शन किया गया। इसके अलावा विश्व सिनेमा से सलेमपुर के लोगों से परिचय कराने के उद्देश्य से मशहूर इरानी फिल्मकार माजिद मजीदी की चिल्ड्रेन आफ हैवेन तथा कई लघु फिल्में दिखाइ्र गईं। फेस्टिवल के समापन के मौके पर जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिव कुमार मिश्र के निधन पर एक मिनट मौन रखकर श्रद्धाजंलि दी गई।
दुसरे दिन  फेस्टिवल को चार सत्रों में बांटा गया था। पहले सत्र में लघु और एनिमेशन फिल्मों के तहत नार्मन मैक्लारेन की नेबर और चेयरी टेल दिखाई गई। नेबर युद्ध विरोधी फिल्म है और यह हमें पड़ोसियों से प्रेम करने का संदेश देती है। इसमें एक खिले फूल को पाने के लिए दो पड़ोसियों के बीच लड़ते हुए मर जाने के रूपक का इस्तेमाल करते हुए बताया गया है कि कैसे झूठे दंभ और ईष्र्या में हम अपने अंदर के मानवीय संवेदनाओं को मार देते हैं और एक हिंसक मनुष्य में तब्दील हो जाते है। चेयरी टेल किताब पढ़ते एक व्यक्ति के कुर्सी पर बैठने की कोशिशों के जरिए सत्ता सम्बन्धांे की बेहद खूबसूरत तरीके से दिखाती है।
फ्रांस के फिल्मकार अलबर्ट लेमोरेसी की शार्ट फिल्म रेड बैलून दर्शकों को खूब पंसद आई। यह फिल्म एक छोटे बच्चे की लाल गुब्बारे से दोस्ती की कहानी है। स्कूल जाते वक्त बच्चे को एक लाल गुब्बारा मिल जाता है जिसे वह हमेशा अपने पास रखता है। घर और स्कूल के लोग इस लाल गुब्बारे को बच्चे से दूर करने की कोशिश करते हैं लेकिन वह हमेशा वापस आ जाता है। लाल गुब्बारे से ईष्या रखने वाले बच्चे एक दिन लाल गुब्बारे को पकड़कर फोड़ देते हैं। इससे दुखी बच्चे को हजारों की संख्या में आए गुब्बारे अपने साथ उड़ाते हुए पेरिस की सैर कराते है। दूसरे सत्र में इरान के प्रसिद्ध फिल्मकार माजिद मजीदी की चिल्डेन आफ हैवेन को दर्शकों ने उमस भरी गर्मी के बीच बड़ी तल्लीनता से देखा। इस फिल्म एक गरीब परिवार के दो बच्चों अली व जेहरा की कहानी है जो एक जोड़ी जूते को ही बारी-बारी पहन कर स्कूल जाते है। अली अपनी बहन के लिए एक जोड़ी जूते पाने के इरादे से रेस कम्पटीशन में भाग लेता है। वह इतनी तेज दौड़ता है उसके प्रथम स्थान मिलता है। उसे बड़ी से ट्राफी दी जाती है और लोग उसे कंधों पर बिठकार खुशी मनाते हैं कि लेकिन अली रो रहा है क्योंकि वह कम्पटीशन में तीसरे स्थान के बजाय फस्र्ट आ गया। वह तीसरे स्थान पर आता तो उसे इनाम में एक जोड़ी जूते मिलते जो वह अपनी बहन को देता।
फेस्टिवल का तीसरा सत्र पूर्वांचल की फिल्मों के नाम रहा। इस सत्र में चार फिल्मों का प्रदर्शन किया गया। फेस्टिवल के आयोजन से जुड़े सलेमपुर के आशीष सिंह और बलदाउ विश्वकर्मा की भोजपुरी फिल्म तोहरी खातिर शराब से बर्बाद होते परिवारों की कहानी है तो सावधान एचआईवी/एड्स के प्रति जागरूक करने वाली म्यूजिक वीडियो है। शायर तश्ना आलमी पर बनी डाक्यूमेंटरी अतश का प्रदर्शन आज के दिन का खास आकर्षण थी। लखनउ के बशीरतपुर के तंग गली में रहने वाला यह शायर अपनी रचनाओं से गरीबी, जातीय भेदभाव, बेरोजगारी और समाज की विद्रूपताओं पर करारा प्रहार करता है। उनकी शायरी में गांवों से शहर की ओर भागते ग्रामीणों के दर्द को आवाज देती है। तश्ना आलमी सलेमपुर के एक गांव शामपुर के मूल निवासी है। अपने जवार के शायर को सिनेमा के पर्दे पर देख दर्शक रोमांचित थे। इस डाक्यूमेंटरी का निर्माण लखनउ फिल्म सोसाइटी की ओर से युवा फिल्मकार अवनीश सिंह ने किया है। इस मौके पर शायर तश्ना आलमी मौजूद थे।
इसके बाद इंसेफेलाइटिस की त्रासदी पर बनी डाक्यूमेंटरी खामोशी दिखाई गई।  गोरखपुर और कुशीनगर जिले में इंसेफेलाइटिस से मरे और विकलांग हुए बच्चों के जरिए रोग की भयावहता, स्वास्थ्य तंत्र की नाकामी को हमारे सामने रखती हुई यह फिल्म सवाल उठाती है कि इस त्रासदी पर हमारा राजनीतिक तंत्र इसलिए खामोश है क्योंकि इस बीमारी के शिकार बच्चे गरीबों के लाल है। इस डाक्यूमंेटरी के प्रदर्शन के बाद दर्शकों ने इसके निदेशक संजय जोशी और मनोज कुमार सिंह से बात भी की। सभी सत्रो का संचालन करते हुए फिल्मों का परिचय संजय जोशी ने दिया।
जन संस्कृति मंच की देवरिया इकाई और लोक तरंग फाउंडेशन ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में बापू महाविद्यालय के सभागार में आयोजित इस फेस्टिवल का समपान सांस्कृतिक कार्यक्रमों और कवि सम्मेलन के साथ हुआ। सांस्कृतिक कार्यक्रम में लघु नाटक का मचन के साथ-साथ लोक नृत्य और लोक गीत भी प्रस्तुत किए गइ। जसम की देवरिया इकाई के संयोजक उदभव मिश्र और लोकतरंग फाउंडेशन टस्ट के अध्यक्ष मिनहाज सोहाग्रवी ने फेस्टिवल को सफल बनाने के लिए सलेमपुर के लोगांे को बधाई दी।


रविवार, 9 जून 2013

इतिहास व राजनीति की गहरी समझ वाले कवि है मनोज पांडेय -मदन मोहन

प्रेमचन्द पार्क में युवा कवि मनोज पांडेय का कविता पाठ
गोरखपुर। युवा कवि मनोज पांडेय इतिहास और राजनीति की गहरी अन्र्तदृष्टि रखने वाले कवि है। यही कारण है कि वह बाबर जैसी कविता लिख पाते है। वह युवा कवियों की उस धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसमें वर्तमान काव्य धारा को अतिक्रमित कर नई दिशा में ले जाने की संभावना दिख रही है।
यह बातें वरिष्ठ कथाकार मदन मोहन ने शनिवार की शाम प्रेमचन्द साहित्य संस्थान द्वारा प्रेमचन्द पार्क में आयोजित युवा कवि मनोज पांडेय की कविताओं पर बातचीत करते हुए कही। उन्होंने कहा कि कविता और कहानी के क्षेत्र में सक्रिय युवा पीढी पर यह आरोप लगाया जाता है कि उनमें इतिहास और राजनीति की समझ नहीं है और उनका अनुभाव एकांगी है। इसी कारण उनकी कविताओं का फलक बड़ा नहीं है लेकिन मनोज पांडेय इनसे एकदम अलग हैं और हमें उनसे काफी उम्मीद है।
इसके पहले युवा कवि मनोज पांडेय ने बाबर, गांधी कैसे गए थे चम्पारण, हमारा समय, चुक जाने के बाद, समझदार लोग, एकतरफा प्रेम, नई पहल, गंध-संवाद, इरोम शर्मिला के लिए शीर्षक कविताओं का पाठ किया। मनोज पांडेय दिल्ली में अध्यापक हैं। मूल रूप से गोरखपुर के निवासी मनोज पांडेय की कविताओं ने इधर समीक्षकों और साहित्कारों का ध्यान आकर्षित किया। उनकी कविताएं कई पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं और चर्चा का विषय बनी हैं।
उनकी कविताओं पर चर्चा शुरू करते हुए युवा साहित्यकार उन्मेष सिन्हा ने कहा कि मनोज की कविताएं व्यंग्यधर्मी कविताए हैं। उनकी कविताएं इतिहास से जिरह करती है। संकटग्रस्त व्यक्ति को अपना हमसफर बनाती है। वरिष्ठ पत्रकार अशोक चैधरी ने कहा कि मनोज की कविताएं नई मान्यताओं का खोज करती है। वरिष्ठ रंगकर्मी राजाराम चैधरी ने कहा कि मनोज की कविताएं समय से मुंह चुराने के बजाय उससे मुठभेड़ करती है। वरिष्ठ कवि श्रीधर मिश्र ने बाबार कविता की प्रशंसा करते हुए कहा कि बाबर के पिता चरित्र का स्थापत्य गढ़ मनोज चुनौती पेश करते है। मनोज प्रतीकों और विम्बों का नय अर्थ प्रकीर्णन कर रहे है। आनन्द पांडेय ने कहा कि मनोज पांडेय की कई कविताएं खास वैचारिक ढांचे और संस्कृतिकरण को तोड़ती है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे अमोल राय ने कहा कि आज की कविताओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे इतिहास का अनुसंधान कर पा रहीं हैं कि नहीं और उनका राजनीतिक विश्लेषण का तात्पर्य हमारे समय के साथ बैठ रहा है कि नही। मनोज की कविताएं दुर्बुद्ध नहीं हैं और इतिहास का अनुसंधान करने में समर्थ हैं। बातचीत में चतुरानन ओझा, नितेन अग्रवाल, मधुसूदन सिंह, विकास द्विवेदी, बैजनाथ मिश्र, आरके सिंह आदि ने भी भागीदारी की। संचालन करते हुए प्रेमचन्द साहित्य संस्थान के सचिव मनोज कुमार सिंह ने कवि मनोज पांडेय का परिचय प्रस्तुत किया।

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