मंगलवार, 10 जुलाई 2012

पहला आजमगढ़ फिल्म फेस्टिवल 14 से


पहले आजमगढ़ फिल्म फेस्टिवल की तैय्यारियाँ जोरों पर हैं. लेखिका और एक्टिविस्ट अरुंधति राय के वक्तव्य से पहले आजमगढ़ फिल्म फेस्टिवल की शुरुआत होगी.
फिल्म फेस्टिवल में अपनी फिल्मों के साथ दिल्ली से संजय काक और अनुपमा श्रीनिवासन और भुबनेश्वर से सूर्य शंकर दाश हिस्सा लेंगे. गोरखपुर फिल्म सोसाइटी की पहली डाक्यूमेंटरी खामोशी, जो कि पूर्वांचल में महामारी की तरह कायम इन्सेफेलाइटिस बीमारी से सम्बंधित है, भी दिखाई जायेगी.इस फेस्टिवल में छोटी - बड़ी 15 फिल्मों के अलावा अशोक भौमिक द्वारा प्रगतिशील भारतीय चित्रकारों के चित्रों की प्रदर्शनी जन चेतना के चितेरे और अजय जेतली और अंकुर द्वारा तैयार विश्व सिनेमा की 11 कालजयी फिल्मों के पोस्टरों की प्रदर्शनी भी दिखाई जायेगी. गोरखपुर फिल्म सोसाइटी भी डीवीडी और किताबों की बिक्री के लिए अपना स्टाल लगाएगी. फेस्टिवल के दूसरे दिन यानि सुबह 11 बजे से लेकर 1 तक बच्चों के लिए एक छोटी और एक फ़ीचर फिल्म दिखाई जायेगी. इस मौके पर अशोक भौमिक  के उपन्यास ' शिप्रा एक नदी का नाम है' का लोकार्पण भी होगा. 
प्रतिरोध के सिनेमा अभियान का यह 26वां और आजमगढ़ का पहला फिल्म फेस्टिवल होगा.  इस फेस्टिवल में शिरकत करने के लिए किसी भी तरह के औपचारिक आमन्त्रण की जरुरत नहीं है.
फेस्टिवल 14 जुलाई को सुबह 11 बजे आजमगढ़ के नेहरु हाल में शुरू होगा. 

शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

राजकीय दमन के खिलाफ जन सम्मेलन आठ जुलाई को
 गोरखपुर । पीयूसीएल, पीयूएचआर, पीपुल्स फोरम, जनसंस्कृति मंच सहित कई जनसंगठनों द्वारा आठ जुलाई को पूर्वान्ह 11 बजे से प्रेस क्लब सभागार में राजकीय दमन के खिलाफ जन सम्मेलन का आयोजन किया गया है। यह आयोजन मानवाधिकार कार्यकर्ता एवं पत्रकार सीमा आजाद व उनके पति विश्वविजय को गिरफ्तार किए जाने तथा देशद्रोह के आरोप में सजा सुनाए जाने के प्रतिरोध में किया गया है। सम्मेलन की अध्यक्षता प्रो अनन्त मिश्र करेंगे जबकि मुख्य वक्ता के रूप में पीयूसीएल के केन्द्रीय सचिव चितरंजन सिंह सम्बोधित करेंगे। यह जानकारी पीयूएचआर के कार्यकारी अध्यक्ष मनोज कुमार सिंह ने एक विज्ञप्ति में दी।


गुरुवार, 10 नवंबर 2011

जान भी ले रहा है बैरी जहजिया

लोकगीतों में पूर्वी उत्तर प्रदेश में गरीब महिलाएं पानी के जहाज और रेलगाड़ी को बैरी मानती रही हंै क्योंकि दोनों उनके पिया को उनसे दूर ले जाते रहे हैं। इक्कीसवीं सदी में पानी का जहाज सैकडों मजदूरों के घर वालांे के लिए पहले से और ज्यादा बैरी हो गया है क्योंकि निष्प्रयोज्य हो चुके पानी के पुराने जहाजों को तोड़ने के काम में पूर्वी उत्तर प्रदेश के गरीब मजदूर न सिर्फ अपनी जान गंवा रहे हैं बल्कि गंभीर बीमारियांे से ग्रसित भी हो रही है लेकिन पेट के लिए उन्हें यह काम करना पड़ रहा है।
गोरखपुर, महराजगंज, कुशीनगर जिले के दर्जनों गांवों के मजदूर गुजरात के बंदरगाहों पर पुराने और निष्प्रयोज्य हो चुके जहाजों को तोड़ने के काम में लगे हैं। इस काम को बेहद खतरनाक माना जाता है।
महराजगंज जिले के कैम्पियरगंज क्षेत्र के मनोहर चक गांव के एक दर्जन से अधिक लोग गुजरात के बंदरगाहों पर पुराने और निष्प्रयोज्य जहाजों को तोड़ने के खतरनाक काम में लगे हुए है। गौकरण चैहान इन्हीं में से एक है। गौकरण चैहान के मुताबिक बगल के गांव पड़हवा से भी 10-12 लोग गुजरात में जहाज तोड़ने का काम करते है। गौकरण वर्ष 2007 में गांव लौट आया था। इसके बाद वह गुजरात नहीं गया क्योंकि घर पर उसके पिता अकेले थे और वह खेती-बारी के काम में उनका हाथ बंटाना चाहता था। उसके मुताबिक जहाज तोड़ने के काम में लगे मजदूरों को पेचिस की बीमारी आम थी। वह भी इसका शिकार हुआ था।
कुशीनगर जिले के कप्तानगंज ब्लाक के बसहिया गांव निवासी 24 वर्षीय गौतम साहनी की पांच मई को गुजरात के सोसिया बन्दरगाह पर एक पुराने जहाज की कटाई के दौरान फायर गैस की चपेट में आकर मौत हो गई। गौतम वहां के विजय वसंल सी.व्रेक्रिगं कंम्पनी 158 में काम करता था। उसका शव आठ मई को गांव आया। सोसिया बन्दरगाह पर काम करने वाले गौतम के ही गांव के अच्छेलाल ने बताया कि कप्तानगंज के अलावे पकडियार, हरिहरनाथ, झंझवा पचार, खबराबार, धिहुही, वरवाखुर्द, नेबुआ नौरगिंया, खपरधिक्का, कुइया पिपराखुर्द, कौवासार, कोटवा सिगंहा, रामकोला के खैरटवा वरवाखुर्द, परसौनी, अडरौना के अलावे महाराजगंज के धुधली नेबुइया के मजदूर यहां कार्य कर रहे है। अच्छेलाल के अनुसाार जहाज काटने के बाद जब रिगं लेकर पानी में उतरते हैं तो उस समय खतरे ज्यादा रहते हैं। फायर गैस के चपेट में आने का खतरा बराबर बना रहता है। कम्पनी वाले पी.एफ तो काटते हैं पर पैसा मिलता नही है।

21 वर्ष में 372 दुर्घटनाएं हुईं
ग्रीन पीस और एफआईडीएच की एक रिपोर्ट ( इंड आफ लाइफ शिप्स-द हयूमन कास्ट आफ ब्रेकिंग शिप्स ) के मुताबिक विश्व के आधे से अधिक समुद्री जहाज अपनी आयु पूरी करने के बाद गुजरात के एलेंज समुद्री तट पर आते हैं जहां उन्हें तोड़ने का काम होता है। इन जहाजों को तोड़कर उनमें से आवश्यक धातुओं को निकाला जाता है जो नए जहाजों के निर्माण में काम आता है। बाकी कबाड़ के रूप में प्रयोग होता है। एलेंज समुद्री तट पर उड़ीसा, बिहार, पश्चिमी बंगाल और उत्तर प्रदेश के हजारों मजदूर काम करते हैं। जहाज तोड़ने का काम अत्यन्त जोखिम भरा है क्योंकि उनको तोड़ते समय कई प्रकार की जहरीली गैसें निकलती हैं जो स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक होती हैं लेकिन मजदूरों को इन्ही जहरीली गैसों के बीच काम करना पड़ता है। परिणाम स्वरूप वे कई तरह की खतरनाक बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। इसके अलावा काम करते समय सिलेण्डर फटने व लोहे की चादर गिरने की घटनाए बहुत होती हैं जिसमें मजदूरों की मौत हो जाती है। इस तरह की घटनाओं का सही आंकड़ा किसी के पास नहीं है। गुजरात मेरीटाइम बोर्ड के रिकार्ड के अनुसार 1983 से 2004 तक जहाज तोड़ने के दौरान 372 दुर्घटनाएं हुईं। बांग्लादेश के चिटगांव में समुद्री जहाज तोड़ने के दौरान होनी वाली दुर्घटनाओं में एक हजार मजदूरों के मर जाने का अनुमान है। इस रिपोर्ट के मुताबिक जहाज तोड़ने के काम में लगे मजदूर बहुत ही गरीब परिवार के होते हैं। इनकी सुरक्षा के लिए किसी प्रकार की सुविधा उपलब्ध नहीं कराई जाती है जिससे दुर्घटनाओं की संख्या ज्यादा है। इन मजदूरों को काम की भी कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है न ही उन्हें उचित पारिश्रमिक मिलती है।
गौतम के बच्चों को कौन देगा सहारा
पाॅच मई को गुजरात के सोसिया बन्दरगाह पर जहाज की कटाई के दौरान फायर गैस के चपेट में आने से मरे कप्तानगंज व्लाक के बसहिया ग्राम निवासी गौतम साहनी के परिजन आर्थिक तंगी से गुजर रहे हैं लेकिन उन्हें कोई सहारा देने वाला नहीं है। जिस कम्पनी के लिए वह काम करता था उसने भी गौतम के परिजनों की कोई मदद नहीं की है। गौतम के परिवार में उसके बुजुर्ग पिता पारस साहनी (65), पत्नी सोमारी (22) और दो छोटे बच्चे पुत्र अभिशेष (3) व पुत्री अर्चना (6माह) हैं।

रविवार, 3 जुलाई 2011

साहित्य ही मेरे लिए जीवन है-प्रो परमानंद

प्रो परमानंद को हिन्दी अकादमी दिल्ली का गद्य विधा सम्मान
गोरखपुर। सुप्रसिद्ध आलोचक एवं कवि प्रो परामानंद श्रीवास्तव को रविवार को प्रेस क्लब सभागार में आयोजित एक समारोह में हिन्दी अकादमी, नई दिल्ली का गद्य विधा सम्मान प्रदान किया गया। अकादमी के सचिव रवीन्द्र श्रीवास्तव परिचय दास ने प्रो परमानंद को सम्मान स्वरूप शाल, सम्मान पत्र, पचास हजार रूपए का चेक प्रदान किया। इस मौके प्रो परमानंद श्रीवास्तव ने कहा कि साहित्य ही मेरे लिए जीवन है और जीवन ही साहित्य है।
प्रो परमानंद को यह सम्मान लेने के लिए दिल्ली जाना था लेकिन वह वहां नहीं जा पाए थे। इस कारण हिन्दी अकादमी ने उन्हें गोरखरपुर आकर यह सम्मान देने का निर्णय लिया था। सम्मान देने के लिए अकादमी के सचिव रवीन्द्र श्रीवास्तव खुद यहां आए थे। सम्मान अर्पण समारोह का आयोजन गोरखपुर जर्नलिस्ट्स प्रेस क्लब और हिन्दी अकादमी ने संयुक्त रूप से किया था। सम्मान प्राप्त करने के बाद प्रो परमानंद ने कहा कि उन्हें अच्छा लग रहा है कि अपने शहर में अपने लोगों के बीच हिन्दी अकादमी का यह सम्मान ग्रहण कर रहे हैं। उन्होंने हिन्दी अकादमी के पुरस्कारों को गैरविवादास्पद बताया और अकादमी द्वारा अपने पुरस्कारों का दायरा राष्टीय स्तर तक बढाने पर प्रसन्नता व्यक्त की। पूर्व में व्यास सम्मान, भारत भारती सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके प्रो परमानंद ने एक लेखक के जीवन में यायावरी और औघड़पन को उर्जा का एक बड़ा स्रोत बताया। इसके पूर्व युवा आलोचक डा अनिल राय ने प्रो परामनंद को इतिहास के भीतर रहते हुए इतिहास के सवालों से टकराने वाले और नया इतिहास को सृजित करने वाला लेखक बताया। हिन्दी अकादमी के सचिव रवीन्द्र श्रीवास्तव ने अकादमी के कार्यों और योजनाओं की चर्चा करते हुए प्रो परामानंद की आलोचना ललित निबंध की तरह हैं और उन्होंने आलोचना को नई भाषा दी है। उनकी आलोचना सिर्फ कविता केन्द्रित नहीं है बल्कि कहानी, उपन्यास सहित कई विधाओं तक जाती है। श्री श्रीवास्तव ने प्रो परामनंद की डायरियों की चर्चा करते हुए हिन्दी अकादमी की ओर से उनके प्रकाशन की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने साहित्यकारांे का आह्वान किया कि वे हिन्दी अकादमी जैसी संस्थाओं को एक वृहततर प्लेटफार्म बनाने के प्रयासों में मदद करें। वरिष्ठ कथाकार प्रो रामदेव शुक्ल ने नए लेखकों, कवियों को प्रोत्साहित करने और उनकी रचनशीलता को रेखांकित करने में प्रो परमानंद के योगदान की चर्चा की। प्रो अनन्त मिश्र ने कहा कि प्रो परमानंद हमेशा नएपन के साथ रहे हैं। आज के समय की कहानी, कविता एक नए संस्करण के दौर में है और निश्चित रूप से प्रो परमानंद इसकी भी अगुवाई करेंगे। कथाकार मदन मोहन ने प्रो परमानंद को प्रेम और प्रतिरोध का लेखक बताया। अध्यक्षता कर रहे प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो हरिशंकर श्रीवास्तव ने प्रो परमानंद ने उपलब्धियां अपने पैर पर खड़े होकर प्राप्त किया। उन्होंने अपना कोई स्कूल नहीं बनाया। वह निरन्तर साहित्य साधना में संलग्न रहे। समारोह को कवि अष्टभुजा शुक्ल, प्रो रामदरश राय, रवीन्द्र श्रीवास्तव जुगानी भाई और दूरदर्शन के पूर्व निदेशक डा उदयभान मिश्र ने भी सम्बोधित किया। स्वागत वक्तव्य प्रेस क्लब के अध्यक्ष अशोक कुमार अज्ञात ने तथा धन्यवाद ज्ञापन डा दीपक प्रकाश त्यागी ने किया। संचालन प्रो परामनंद पर डाक्यूमेन्टी फिल्म बना चुके फिल्मकार प्रदीप सुविज्ञ ने किया। इस अवसर पर कवयित्री रंजना जायसवाल, अनिता अग्रवाल, प्रो अशोक कुमार सक्सेना, वरिष्ठ कवि देवेन्द्र आर्य, कथाकार लाल बहादुर, कमलेश गुप्ता, सिद्धार्थ शंकर, सत्यनारायण मिश्र, डा मुन्ना तिवारी, जगदीश श्रीवास्तव, उन्मेष सिन्हा, मनोज कुमार सिंह, आरिफ अजीज लेनिन, आसिफ सईद आदि उपस्थित थे।

शनिवार, 2 जुलाई 2011

भ्रष्टाचार और कार्पोरेट लूट के खिलाफ लड़ाई देश को बचाने की लड़ाई -संदीप सिंह



भ्रष्टाचार और कार्पोरेट लूट के खिलाफ गोरखपुर में 26 जून को प्रेस क्लब सभागार में यूथ कन्वेंशन का आयोजन किया गया जिसको बतौर वक्ता जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष एवं आईसा के नेशनल प्रेसीडेन्ट संदीप सिंह ने सम्बोधित किया। पेश है सम्मेलन की संक्षिप्त रिपोर्ट-

गोरखपुर। देश के कार्पोरेट घरानों को आज 240 करोड़ रूपए प्रतिदिन विभिन्न प्रकार के टैक्स में छूट दी जा रही है और इतना ही धन प्रतिदिन देश के बाहर जा रहा है। वर्ष 1948 -2008 तक 462 बिलियन डालर धन देश के बाहर भेज दिया गया। यह सब कुछ कार्पोरेट घरानों के पक्ष में नीतियों को बनाकर और देश के संसाधनों की लूट की खुली छूट देकर किया गया है। इसलिए भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई व्यक्ति केन्द्रित के बजाय नीतियों के जरिए देश को बेचने की कोशिश पर फोकस होनी चाहिए। हम इन्ही मुद्दों पर छात्रों-नौजवानों को गोलबंद कर व्यापक आंदोलन खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं।
यह बातें आल इंडिया स्टूडेन्ट एसोसिएशन आइसा के राष्टीय अध्यक्ष एवं जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष संदीप सिंह ने सोमवार 27 जून को गोरखपुर प्रेस क्लब के सभागार में भ्रष्टाचार और कार्पोरेट लूट के खिलाफ युवा सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए कही। यह आयोजन पीपुल्स फोरम और इंकलाबी नौजवान सभा ने संयुक्त रूप से किया था।उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार और कार्पोरेट लूट के खिलाफ भारतीय समाज में उद्धेलन व बेचैनी है जिसकी अभिव्यक्ति विभिन्न प्रकार के आंदोलनों में हो रही है। श्री सिंह ने कहा कि भ्रष्टाचार को व्यक्ति केन्द्रित या घोटाला केन्द्रित कर बहस हो रही है जिससे असल मुद्दा पीछे हो जा रहा है। असल मुद्दा यह है कि देश के संसाधनों को लूटा और बेचा जा रहा है और अबाध लूट को आसान बनाने के लिए कार्पोरेट घरानों के पक्ष में नीतियां व कानून बनाए जा रहे हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि विदेश संचार निगम की 1200 एकड़ जमीन और 1400 करोड़ की पूंजी को सिर्फ टाटा को सिर्फ 1439 करोड़ में बेच दिया गया। इसी तरह कर्नाटक में रेड्उी बंधुओं की लौह अयस्क वैध-अवैध खनन की खुली छूट दी गई है जिसके एवज में मामूली रायल्टी ली जा रही है। ऐसे मामले में लोकपाल या कोई सख्त कानून भी क्या कर सकता है। भ्रष्टाचार को जन्म देनी वाली नीतियों के बदले बगैर भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों पर ही भरोसा करना ऐसा ही है जैसे कि गंदगी स्रोत किए बिना घर की साफ सफाई करते रहना।
श्री सिंह ने कहा कि सरकारों ने एकतरफ कार्पोरेट घरानों को लूट की पूरी छूट दी तो दूसरी ओर शिक्षा, स्वास्थ्य और गरीबों-मजदूरों के हित में चल रही योजनाओं में धन की कटौती की। उन्होंने कहा कि हम भ्रष्टाचार विरोधी लड़ाई को नई आर्थिक नीतियों व निजीकरण के खिलाफ तक ले जाना चाहते हैं और इसी मकसद से देश भर में घूम-घूमकर छात्रों-नौजवानों को गोलबंद कर रहे हैं। स्टूडेन्ट यूथ एंगेस्ट करप्शन के तहत नौ अगस्त से जंतर-मंतर पर हजारों नौजवानों की जुटान कर हम सरकार को एक बड़ा धक्का मारेंगे। श्री सिंह ने लोकपाल के अन्तर्गत प्रधानमंत्री और न्यायधीशों को लाए जाने की वकालत करते हुए बुद्धिजीवियों से सत्ता के बहकावे में न आने की अपील की। उन्होंने जनआंदोलनों से संसद की सर्वोच्चता और लोकतंत्र के कमजोर होने के तर्क को बेतुका बताते हुए कहा कि खुद सरकार ने संविधान और संसद को किनारे कर जनविरोधी नीतियां बना रही है और लागू कर रही है।उन्होंने भ्रष्टाचार और कार्पोरेट लूट के खिलाफ आंदोलन को देश और उसकी सम्प्रभुता बचाने की लड़ाई बताते हुए कहा कि इस लड़ाई में हर देशभक्त को शरीक होना चाहिए।
सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कथाकार मदन मोहन ने कहा कि परिवर्तन की लड़ाई को मुकम्मल ताकत देने के लिए सभी वर्गों को इससे जोड़ने की अपील की। सम्मेलन को शिवनंदन, चतुरानन ओझा और अशोक चैधरी ने भी सम्बोधित किया।संचालन पत्रकार मनोज कुमार सिंह ने और धन्यवाद ज्ञापन लखनउ विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र नेता राकेश सिंह ने किया। सम्मेलन में वरिष्ठ कवि देवेन्द्र आर्य, टेड यूनियन नेता राकेश सिंह, नितेन अग्रवाल, भाकपा माले नेता राजेश साहनी, जितेन्द्र द्विवेदी, मारकण्डेय मणि, असीम सत्यदेव आदि उपस्थित थे।

मंगलवार, 7 जून 2011

डरी हुई सरकार का कायराना कारनामा

बाबा रामदेव और उनके समर्थकों पर दिल्ली में पुलिस कार्यवाही पर जसम का बयान

नई दिल्ली , ६ जून, २०११
४/५ जून की मध्यरात्री में यु.पी.ए. सरकार द्वारा योगगुरु रामदेव के आह्वान पर भ्रष्टाचार-विरोधी मुहीम में दूर-दराज़ से आए लोगों पर रात के अँधेरे में उन्हें सोते में औचक ही सरकारी दमन का शिकार बनाना एक डरी हुई सरकार का कायराना कारनामा है. इस घटना से सरकार ने यह सन्देश भी दिया है कि वह कारपोरेट हितों के खिलाफ असली या नकली किसी भी प्रतिरोध को झेल नहीं सकती. भ्रष्टाचार का सवाल सीधे -सीधे निजीकरण-उदारीकरण और खगोलीकरण की अमीरपरस्त-साम्राज्यपरस्त नीतियों पर चोट करता है. तमाम सत्ता की पार्टियां इस दलाल अर्थतंत्र का हिस्सा हैं, लिहाजा मुख्यधारा की राजनीति में मुख्य प्रतिपक्ष ने जो जगह छोडी है, उसे नागरिक समाज की शक्तियां और दूसरे जन-आन्दोलन भर सकते हैं. इन आन्दोलनों की तमाम कमियों कमजोरियों के बावजूद लोगों का इनके आह्वान पर जुटना स्वाभाविक है. ऐसे में सरकार इन पर हर कहीं दमन पर उतारू है.
रामदेव की राजनीतिक महत्वाकांक्षा, उनके द्वारा संघ परिवार के नेटवर्क का इस्तेमाल और संघ द्वारा उनके इस्तेमाल का अवसरवाद , खुद रामदेव के ट्रस्ट की परिसंपत्तियों के विवादित स्रोतों के बारे में शायद ही किसी सजग व्यक्ति को भ्रम हो. दिल्ली आने से पहले से ही सरकार के साथ उनका मोल-तोल जारी था. उन्होंने लोकपाल विधेयक में प्रधानमंत्री और जजों को जांच के दायरे में शामिल न किए जाने की मांग कर नागरिक समाज द्वारा प्रस्तावित विधेयक को कमज़ोर करने और सरकार को खुश करने की भी कोशिश की थी. हवाई अड्डे पर सरकार के कई मंत्रियों का उनसे मिलने पहुँचना , बालकृष्ण का आन्दोलन आगे न चलाने के वचन वाला पत्र , सभी कुछ सरकार और उनके बीच बहुविध लेन-देन और सौदेबाजी की तस्दीक करता है, लेकिन इसके बावजूद पुलिसिया दमन और आतंक को कहीं से भी जायज़ नहीं ठहराया जा सकता. जंतर मंतर पर भी लोगों के जमावड़े पर प्रतिबन्ध लगाकर सरकार ने अपने इरादे ज़ाहिर कर दिए हैं. यह दमन राजधानी में सिर्फ रामदेव पर नहीं रुकेगा, बल्कि किसी भी आन्दोलन , धरने और प्रदर्शन के दमन का रास्ता साफ़ हुआ है. शेष भारत में, आदिवासी इलाकों में, किसानों के आन्दोलनों पर, बड़ी देशी-विदेशी पूंजी के दोहन के खिलाफ यह दमन जारी ही है. दिल्ली इसका अपवाद नहीं बनी रह सकती.
लिहाजा इस घटना को अघोषित आपातकाल की एक कड़ी के रूप में ही देखना चाहिए और इसके दमनकारी अभिप्राय को नागरिक समाज को कम करके नहीं आंकना चाहिए. हम इस घटना की और इसकी ज़िम्मेदार केंद्र सरकार की घोर भर्त्सना करते हैं और आम नागरिक और बुद्धिजीवियों से भी इसके पुरजोर विरोध की अपील करते हैं.
(प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी )

गोरखपुर में 3 मई को मज़दूरों पर हुई फायरिंग और वहां जारी मज़दूर आन्दोलन के दमन पर मीडियाकर्मियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की तीन-सदस्यीय जांच टीम की रिपोर्ट

नई दिल्ली, 3 जून। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर शहर में 3 मई को एक कारखाने के मज़दूरों पर हुई फायरिंग की जांच करने वाले मीडियाकर्मियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के जांच दल ने वहां ज़िला प्रशासन और पुलिस की भूमिका पर सवाल खड़े करते हुए समस्त घटनाओं की उच्च स्तरीय न्यायिक जांच कराने की मांग की है।
इस जांच दल ने 19 से 21 मई तक गोरखपुर का दौरा करके और विभिन्न पक्षों से बात करने के बाद आज नई दिल्ली में अपनी जांच रिपोर्ट जारी की। इस जांच दल में दिल्ली के पत्रकार नागार्जुन सिंह, फिल्मकार चारु चन्द्र पाठक और कोलकाता के पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता सौरभ बनर्जी शामिल थे। तीन दिनों के दौरान जांच दल ने विभिन्न प्रशासनिक अधिकारियों, श्रम विभाग, स्थानीय सामाजिक संगठनों, राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों, श्रम संगठनों, मीडियाकर्मियों, श्रमिकों, श्रमिक नेताओं और प्रबुद्ध नागरिकों से मुलाकात करके इस पूरे घटनाक्रम की विस्तृत जांच की।
रिपोर्ट के अनुसार फायरिंग की घटना का तात्कालिक कारण यह था कि कई कारखानों के करीब 1500 मज़दूर 1 मई को आयोजित मज़दूर मांगपत्रक आंदोलन की रैली में शामिल होने के लिए दिल्ली चले गये थे जबकि कारखाना मालिकान इसका विरोध कर रहे थे। दिल्ली से लौटने पर 18 चुनिंदा श्रमिकों को निलंबित कर दिया गया। 3 मई को हथियारबंद लोग जब श्रमिक नेता प्रशांत को जबर्दस्ती फैक्टरी के अंदर ले जाने का प्रयास कर रहे थे तब श्रमिक आक्रोशित हुए और इसके विरोध तथा अपने बचाव में उन्होंने पथराव किया। इसके बाद फैक्टरी के अंदर से हुई फायरिंग में 19 मज़दूर और एक छात्रा घायल हो गये।
जांच टीम इस निष्कर्ष पर पहुंची कि 3 मई को हुई फायरिंग एक अलग-थलग घटना नहीं बल्कि गोरखपुर में दो वर्ष से मालिकों और मज़दूरों के बीच में चल रहे टकराव की ही परिणति है। पिछले लगभग दो वर्ष से मज़दूर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करते आ रहे हैं जो अब संगठित रूप ले चुका है। यह फैक्टरी प्रबंधन के लिए चिंता का सबब बन चुका है। श्रमिकों के प्रति प्रशासनिक दृष्टिकोण भी सहयोगात्मक नहीं है। जांच में यह बात मुख्य रूप से उभर कर आई कि श्रमिकों का पक्ष पूरी तरह नहीं सुना जा रहा है और प्रशासनिक स्तर पर उपेक्षा और बल प्रयोग से बात और बिगड़ रही है।
जांच टीम ने अपनी रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश शासन से मांग की है कि अंकुर उद्योग लि. में हुई फायरिंग की उच्च स्तरीय जांच करायी जानी चाहिए। टीम कमिश्नर द्वारा मजिस्ट्रेट जांच के आदेश को असंगत मानती है क्योंकि पूरे प्रकरण में प्रशासनिक भूमिका संदेह के दायरे में है। टीम की अन्य संस्तुतियों में फायरिंग के दोषी व्यक्तियों की गिरफ्तारी, श्रमिकों तथा उनके नेतृत्व से सौहार्दपूर्ण माहौल में वार्ता करके उनकी समस्याओं का समाधान करना, गोरखपुर औद्योगिक क्षेत्र की फैक्टरियों में श्रम कानूनों की वास्तविक तस्वीर सामने लाना और इनमें श्रम कानूनों के अनुपालन को सुनिश्चित कराना, पुलिस की भूमिका की जांच कराना और गोलीकांड में घायल लोगों को सरकार द्वारा उचित मुआवजा दिया जाना शामिल है।

- नागार्जुन सिंह, वरिष्ठ उप-सम्पादक, हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
फोनः 9953623417, ईमेलः दंहंतरनदंण्ेपदही/हउंपसण्बवउ
- सौरभ बनर्जी, फोनः 9811841341, ईमेलः ेवनतंअइंदमतरमम25/लंीववण्बवण्पद
- चारु चन्द्र पाठक, दिल्ली, फोनः 9818376996, ईमेलः बींतनबींदकतं1234/हउंपसण्बवउ