शनिवार, 26 फ़रवरी 2011

संस्कृति कर्मियों के लिए प्रकाश स्तम्भ थे



गोरखपुर। जन संस्कृति मंच के संस्थापक सदस्य, कला समीक्षक, पत्रकार एवं कथाकार अनिल सिन्हा के निधन पर शनिवार (26 feb ko )को प्रेमचन्द पार्क में हुई एक शोक सभा में शहर के साहित्यकारों, संस्कृति कर्मियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उन्हें श्रद्धाजंलि दी।
वरिष्ठ कथाकार मदन मोहन की अध्यक्षता में जनसंस्कृति मंच द्वारा आयोजित इस शोक सभा में वक्ताओं ने कहा कि जन संस्कृति मंच के कर्मठ और विचारवान साथी अनिल सिन्हा आजीवन प्रगतिशील मूल्यों के लिए संघर्ष करते रहे। वह अपनी विचारधारात्मक प्रतिबद्धता और जन पक्षधरता से कभी डिगे नहीं। वह जसम के संस्थापक सदस्य, उत्तर प्रदेश इकाई के पहले सचिव और राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य रहे। उनका संगठन की गतिविधियों के प्रति उत्साह सबके लिए प्रेरणास्पद थां। उन्होंने एक प्रतिभाशाली और प्रखर पत्रकार के रूप में कई पत्र-पत्रिकाओं, अमृत प्रभात, नव भारत टाइम्स आदि में काम किया। राष्ट्रीय सहारा के स्थानीय संस्करण में सर्जना नामक स्तम्भ लिखा। उन्होंने 70 के दशक में पटना से विनिमय नाम की साहित्यिक पत्रिका निकाल लघुपत्रिका आन्दोलन में योग दिया। उनकी कहानियों का एक संग्रह मठ चर्चित रहा. उनकी सर्जानात्मक रुचियों की परिधि बहुत व्यापक थी जिसमें पत्रकारिता से लेकर चित्रकला, सिनेमा जैसे माध्यम भी शामिल थे। सीपीआई एमएल के साथ उनका गहरा और पुराना रिश्ता था।
शोक सभा में युवा आलोचक कपिलदेव ने कहा कि अनिल सिन्हा ने माक्र्सवादी विचारधारा को संस्कृति के क्षेत्र में कार्यरूप में उतारने का जीवन भर प्रयास किया। उन्होंने अनिल सिन्हा की स्मृति में उनके व्यक्तित्व व कृतित्व पर आयोजन का सुझाव दिया। शोक सभा की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कथाकार मदनमोहन ने जनसंस्कृति मंच की स्थापना के दौरान अनिल सिन्हा की सक्रियता को याद करते हुए कहा कि विचारधारा और संस्कृति कंे अन्तर सम्बन्धों को लेकर उनकी उनसे काफी संवाद रहा; उनका सम्पूर्ण लेखन जनता की मुक्ति के लिए था; वह जितने सरल व सादे थे वैचारिक रूप यसे उतने ही दृढ थे। शोक सभा मे दो मिनट मौन रखकर अनिल सिन्हा को श्रद्धाजलि दी गई। शोक सभा का संचालन करते हुए जनसंस्कृति मंच के प्रदेश सचिव मनोज कुमार सिंह ने कहा कि अनिल सिन्हा उन जैसे युवा संस्कृति कर्मियों के लिए प्रकाश स्तम्भ थे। शोक सभा में पत्रकार अशोक चैधरी, वेद प्रकाश, रंग कर्मी आरिफ अजीज लेनिन, अशोक राव, बैजनाथ मिश्र, भाकपा माले के जिला सचिव राजेश साहनी, हरिद्वार प्रसाद, बैजनाथ मिश्र, गोपाल राय, पीयूएचआर के जिला सचिव श्याममिलन आदि उपस्थित थे।

बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

गोरखपुर फिल्म सोसाइटी का कार्यक्रम-प्रदीप सुविज्ञ की काव्य फिल्म आधी दुनिया प्रदर्शन







गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के तत्वावधान में 20 फरवरी को प्रेस क्लब सभागार में फिल्मकार प्रदीप सुविज्ञ की काव्य फिल्म आधी दुनिया दिखाई गई। इस फिल्म को देखने के लिए बड़ी संख्या में साहित्यकार, रंगकर्मी व सामाजिक कार्यकर्ता आए।
आठ कवियों प्रो परमानंद श्रीवास्वत (दक्षा पटेल) , प्रो विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ( उड़ गई मां), महेश अश्क ( उसने देखी फिर अपनी फटी साड़ी), सुरेन्द्र काले (संजना सोमेश), देवेन्द्र कुमार आय (सुन्दर हो तुम) , प्रमोद कुमार (कल तुम होगी और करीब), डा रंजना जायसवाल ( जी चाहता है) और वशिष्ठ अनूप (खूश्बू का बंधन) की रचनाओं पर आधारित इस फिल्म में औरतों की दुनिया के दुख-दर्द की अभिव्यक्ति हुई है। आधे घंटे की इस फिल्म के प्रदर्शन के बाद हुई चर्चा में भाग लेते हुए वरिष्ठ कवि महेश अश्क ने कहा कि प्रदीप सुविज्ञ ने इस फिल्म में कविता की आत्मा को समझा है। यह फिल्म हमारे जीवन में औरतों की भूमिका को परिभाषित करते हुए एक नए अनुभव को विस्तार देती है। उन्होंने कहा कि फिल्म में उनकी जिस गजल को लिया गया है वह उन्होंने करीब 30 वर्ष पहले लिखी थी। तब उर्दू-हिन्दी में जिंदगी को शब्दों में व्यक्त करने की चुनौती थी। फिल्म में उनकी रचना की संवेदनात्मक धरातल को बेहतर तरीके से व्यक्त किया है। डा रंजना जायसवाल ने फिल्म में अपनी कविता की अंतिम पंक्तियों के विजुअल एक्सप्रेशन पर असहमति जताई और कहा कि कविता का मर्म ठीक से अभिव्यक्त नहीं हो पाया है। कथाकार मदन मोहन ने रचनाकार की असहमति को स्वीकार करने पर जोर देते हुए कहा कि यह एक बड़ी चुनौती है कि कवि संवेदना के जिस धरातल पर शब्द देता है उसे कोई दूसरा माध्यम कैसे अभिव्यक्ति करे। उन्होंने इस काव्य फिल्म के बनने और उसके प्रदर्शन को शहर के लिए एक घटना बताया। युवा आलोचक प्रो अनिल राय ने कहा कि शाब्दिक संरचना को दृश्य संरचना में रूपान्तरित करने के दौरान एक तरह से रचना की पुनप्र्रस्तुति होती है। कवि प्रमोद कुमार ने कहा कि फिल्म के दृश्य विम्बो की सराहना की। वरिष्ठ कवि एवं आलोचक प्रो परमान्द श्रीवास्तव ने दक्षा पटेल कविता की पृष्ठिभूमि की चर्चा करते हुए कहा कि फिल्म ने कविता को बड़ा अर्थ दिया है। इस मौके पर प्रो विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की अनुपस्थिति में फिल्म पर उनकी टिप्पणी पढ़ी गई जिसमें उन्होंने कहा है कि शब्द अपना मूल रूप जिस अर्थ में ग्रहण करते हैं वह दृश्य ही होता है। शब्द अततः संकेत ही होते हैं, अर्थ तो पदार्थ ही है। प्रदीप सुविज्ञ ने पद को पदार्थ देने का प्रयत्न किया है।
फिल्मकार प्रदीप सुविज्ञ ने फिल्म निर्माण के दौरान हुए अनुभवों को साझा किया और फिल्म में अभिनय करने वाले कलाकारों वंदना दास, भावना सिह, सपना सिंह, रीता श्रीवास्तव, रतना सिन्हा, राजेश पांडेय, मानवेन्द्र त्रिपाठी, सौम्या वाई कृष्णमूर्ति, गगनदीप आर्य, कविता आर्य, राजेश राज, रवीन्द्र रंगधर, सुशील सिंह, डेजी सिराफिन, मास्टर गीत, कैमरामैन राजेश रणजीत, संगीत निर्देशक केके सिंह, सम्पादन करने वाले तारिक खान का परिचय कराया। फिल्म में कविता पाठ सुकृति अस्थाना और प्रदीप सुविज्ञ का था। इस अवसर पर डा चन्द्रभूषण अंकुर, अमोल राय, मनीष चैबे, गोपाल राय, आईएच सिद्दीकी, नितिन अग्रवाल, डा मुमताज खान, आशीष, अशोक चैधरी आदि उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के संयोजक मनोज कुमार सिंह ने किया।






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मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

gorakh ke ganw men jan sanskriti manch ka sammelan








गोरख स्मृति संकल्प और जसम, उत्तर प्रदेश का पांचवा राज्य सम्मेलन 29-30 जनवरी 2011 को कवि गोरख पांडेय के गांव में संपन्न हुआ। गोरख के गुजरने के 21 साल बाद जब पिछले बरस लोग देवरिया जनपद के इस ‘पंडित का मुंडेरा’ गांव में जुटे थे, तब करीब 65 लोगों ने गोरख से जुड़ी अपनी यादों को साझा किया था। इस बार भी वे उत्प्रेरक यादें थीं। उनके सहपाठी अमरनाथ द्विवेदी ने संस्कृत विश्वविद्यालय में छात्रसंघ के अध्यक्ष और बीचयू में एक आंदोलनकारी छात्र के बतौर उनकी भूमिका को याद किया। उन्होंने बताया कि गोरख अंग्रेजी के वर्चस्व के विरोधी थे, लेकिन हिंदी के कट्टरतावाद और शुद्धतावाद के पक्षधर नहीं थे। बीचयू में संघी कुलपति के खिलाफ उन्होंने छात्रों के आंदोलन का नेतृत्व किया, जिसके कारण उन्हें विश्वविद्यालय प्रशासन की यातना भी झेलनी पड़ी। साम्राज्यवादी-सामंती शोषण के खिलाफ संघर्ष के लिए उन्होंने नक्सलवादी आंदोलन का रास्ता चुना और उसके पक्ष में लिखा। जहां भी जिस परिवार के संपर्क में वे रहे उसे उस आंदोलन से जोड़ने की कोशिश की। भर्राई हुई आवाज में राजेेंद्र मिश्र ने उनकी अंतिम यात्रा में उमड़े छात्र-नौजवानों, रचनाकारों और बुद्धिजीवियों के जनसैलाब को फख्र से याद करते हुए कहा कि मजदूरों और गरीबों की तकलीफ से वे बहुत दुखी रहते थे। फसल कटाई के समय वे हमेशा उनसे कहते कि पहले वे अपनी जरूरत भर हिस्सा घर ले जाएं, उसके बाद ही खेत के मालिक को दें। पारसनाथ जी के अनुसार वे कहते थे कि अन्याय और शोषण के राज का तख्ता बदल देना है और सचमुच उनमें तख्ता बदल देने की ताकत थी। गोरख की बहन बादामी देवी ने बड़े प्यार से उन्हें याद किया। उन्हें सुनते हुए ऐसा लगा जैसे गोरख की बुआ भी वैसी ही रही होंगी, जिन पर उन्होंने अपनी एक मशहूर कविता लिखी थी।
जसम महासचिव प्रणय कृष्ण ने कहा कि जिस संगठन को गोरख ने बनाया था उसकी तरफ से उनकी कविता और विचार की दुनिया को याद करते हुए खुद को नई उर्जा से लैस करने हमलोग उनके गांव आए हैं। गोरख ने मेहनतकश जनता के संघर्ष और उनकी संस्कृति को उन्हीं की बोली और धुनों में पिरोकर वापस उन तक पहुंचाया था। उन्होंने सत्ता की संस्कृति के प्रतिपक्ष में जनसंस्कृति को खड़ा किया था, आज उसे ताकतवर बनाना ही सांस्कृतिक आंदोलन का प्रमुख कार्यभार है। इसके बाद ‘जनभाषा और जनसंस्कृति की चुनौतियां’ विषय पर जो संगोष्ठी हुई वह भी इसी फिक्र से बावस्ता थी। आलोचक गोपाल प्रधान दो टूक तरीके से कहा कि हर चीज की तरह संस्कृति का निर्माण भी मेहनतकश जनता करती है, लेकिन बाद में सत्ता उस पर कब्जा करने की कोशिश करती है। भोजपुरी और अन्य जनभाषाओं का बाजारू इस्तेमाल इसलिए संभव हुआ है कि किसान आंदोलन कमजोर हुआ है। समकालीन भोजपुरी साहित्य के संपादक अरुणेश नीरन ने कहा कि जन और अभिजन के बीच हमेशा संघर्ष होता है, जन के पास एक भाषा होती है जिसकी शक्ति को अभिजन कभी स्वीकार नहीं करता, क्योंकि उसे स्वीकार करने का मतलब है उस जन की शक्ति को भी स्वीकार करना। कवि प्रकाश उदय का मानना था कि सत्ता की संस्कृति के विपरीत जनता की संस्कृति हमेशा जनभाषा में ही अभिव्यक्त होगी। कवि बलभद्र की मुख्य चिंता भोजपुरी की रचनाशीलता को रेखांकित किए जाने और भोजपुरी पर पड़ते बाजारवादी प्रभाव को लेकर थी। प्रो. राजेंद्र कुमार ने कहा कि जीवित संस्कृतियां सिर्फ यह सवाल नहीं करतीं कि हम कहां थे, बल्कि वे सवाल उठाती हैं कि हम कहां हैं। आज अर्जन की होड़ है, सर्जन के लिए स्पेस कम होता जा रहा है। सत्ता की संस्कृति हर चीज की अपनी जरूरत और हितों के अनुसार अनुकूलित करती है, जबकि संस्कृति की सत्ता जनता को मुक्त करना चाहती है। प्रेमशीला शुक्ल ने जनभाषा के जन से कटने पर फिक्र जाहिर की। विद्रोही जी ने कहा कि हिंदी और उससे जुड़ी जनभाषाओं के बीच कोई टकराव नहीं है, बल्कि दोनों का विकास हो रहा है। हमें गौर इस बात पर करना चाहिए कि उनमें कहा क्या जा रहा है। संगोष्ठी के अध्यक्ष और सांस्कृतिक-राजनैतिक आंदोलन में गोरख के अभिन्न साथी रामजी राय ने कहा कि गोरख उन्हें हमेशा जीवित लगते हैं, वे स्मृति नहीं हैं उनके लिए। जनभाषा में लिखना एक सचेतन चुनाव था। उन्होंने न केवल जनता की भाषा और धुनों को क्रांतिकारी राजनीति की उर्जा से लैस कर उन तक पहुंचाया, बल्कि खड़ी बोली की कविताओं को भी लोकप्रचलित धुनों में ढाला, ‘पैसे का गीत’ इसका उदाहरण है। अपने पूर्ववर्ती कवियों और शायरों की पंक्तियों को भी गोरख ने बदले हुए समकालीन वैचारिक अर्थसंदर्भों के साथ पेश किया। रामजी राय ने कहा कि जनभाषाएं हिंदी की ताकत हैं और बकौल त्रिलोचन हिंदी की कविता उनकी कविता है जिनकी सांसों को आराम न था। सत्ता के पाखंड और झूठ का निर्भीकता के साथ पर्दाफाश करने के कारण ही गोरख की कविता जनता के बीच बेहद लोकप्रिय हुई। ‘समाजवाद बबुआ धीरे धीरे आई’ संविधान में समाजवाद का शब्द जोड़कर जनता को भ्रमित करने की शासकवर्गीय चालाकी का ही तो पर्दाफाश करती है जिसकी लोकप्रियता ने भाषाओं की सीमाओं को भी तोड़ दिया था, कई भाषाओं में इस गीत का अनुवाद हुआ। रामजी राय ने गोरख की कविता ‘बुआ के नाम’ का जिक्र करते हुए कहा कि मां पर तो हिंदी में बहुत-सी कविताएं लिखी गई हैं, पर यह कविता इस मायने में उनसे भिन्न है कि इसमें बुआ को मां से भी बड़ी कहा गया है। संगोष्ठी का संचालन आलोचक आशुतोष कुमार ने किया।
सांस्कृतिक सत्र में हिरावल (बिहार) के संतोष झा, समता राय, डी.पी. सोनी, राजन और रूनझुन तथा स्थानीय गायन टीम के जितेंद्र प्रजापति और उनके साथियों ने गोरख के गीतों का गायन किया। संकल्प (बलिया) के आशीष त्रिवेदी, समीर खान, शैलेंद्र मिश्र, कृष्ण कुमार मिट्ठू, ओमप्रकाश और अतुल कुमार राय ने गोरख पांडेय, अदम गोंडवी, उदय प्रकाश, विमल कुमार और धर्मवीर भारती की कविताओं पर आधारित एक प्रभावशाली नाट्य प्रस्तुति की। शैलेन्द्र मिश्र ने भिखारी ठाकुर के मशहूर नाटक विदेशिया के गीत भी सुनाए, इस दौरान लोकधुनों का जादुई असर से लोग मंत्रमुग्ध हो गए। इस अवसर पर एक काव्यगोष्ठी भी हुई, जिसमें अष्टभुजा शुक्ल, कमल किशोर श्रमिक, रमाशंकर यादव विद्रोही, राजेंद्र कुमार, कौशल किशोर, रामजी राय, प्रभा दीक्षित, चंद्रेश्वर, भगवान स्वरूप कटियार, डाॅ. चतुरानन ओझा, सच्चिदानंद, मन्नू राय, सरोज कुमार पांडेय ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। संचालन सुधीर सुमन ने किया।
सम्मेलन में प्रतिनिधियों ने मनोज सिंह को जसम, उ.प्र. के राज्य सचिव और प्रो. राजेद्र कुमार को अध्यक्ष के रूप में चुनाव किया। इसके अलावा बलराज पांडेय, चन्द्रेश्वर, भगवान स्वरूप कटियार, प्रभा दीक्षित व कौशल किशोर उपाध्यक्ष चुने गए। कार्यकारिणी में बलिया से रगकर्मी आशीष त्रिवेदी, गोरखपुर से अशोक चैधरी, देवरिया से उद्भव मिश्र, बरेली से शालिनी, इलाहाबाद से केके पांडेय व दुर्गा तथा लखनउ से राजेश कुमार व ब्रजनारायण गौड लिए गए हैं। साथ में 60 सदस्यीय राज्य परिषद का भी गठन किया गया। सांगठनिक सत्र में निवर्तमान महासचिव डा आशुतोष कुमार ने संगठन की गतिविधियों पर रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए कहा कि जसम की उपलब्धि है कि वह नई सांस्कृतिक परिस्थिति के प्रति सचेत है और जनमुक्ति की सांस्कृतिक कार्रवाइयों को उसके अनुरूप विकसित करने की कोशिशों से मुब्तिला है। उन्होंने प्रदेश की राजनीतिक, आर्थिक व सांस्कृतिक स्थितियों की विस्तृत चर्चा करते हुए कहा कि दमन और भ्रष्टाचार की राजनीति ने रूढिपरस्ती, अंध आस्था, मूर्तिपूजा और फूहडपन की संस्कृति को बढावा दिया है। ऐसे में जनसंस्कृति मंच ने संघर्ष की राजनीति के साथ खडे होते हुए प्रतिरोध की संस्कृति का नारा दिया है। इसी के तहत हमने साहित्य, संस्कृति, कला, नाट्य और सिनेमा से सम्बन्धित गतिविधियों में नए प्रयोग किए हैं और नए इलाके जोडे हैं। इस अवसर पर एक स्मारिका भी प्रकाशित की गई है, जिसमें गोरख की डायरी से प्राप्त कुछ अप्रकाशित कविताएं, जनसंस्कृति की अवधारणा पर उनका लेख और उनके जीवन और रचनाकर्म से संबंधित शमशेर बहादुर सिंह, महेश्वर और आशुतोष के लेख और साक्षात्कार हैं।
इस मौके पर जसम के राष्टीय महासचिव प्रणय कृष्ण, प्रदेश अध्यक्ष प्रो राजेन्द्र कुमार, रामजी राय, फिल्मकार अजय भारद्धाज, संजय जोशी, कथाकार सुभाष कुशवाहा, मदन मोहन, डा अनिल राय, डा मुन्ना तिवारी, बलभद्र मिश्र, अरूणेश नीरन, उद्भव मिश्र, ब्रजेन्द्र मिश्र, सरोज पांडेय, मीना राय, गोपाल प्रधान, प्रेमशंकर, बैजनाथ मिश्र, विकास नारायन, गोपाल राय, केके वत्स, वीएन गौड, गंगाजी, संतोष झा, डीपी सोनी, समता राय, राजन आदि के अलावा गोरख पांडेय के परिवार के बलराम पांडेय, राजेन्द्र मिश्र आदि उपस्थित थे।

मंगलवार, 31 अगस्त 2010

साइलेंस

मई 2010 के पहले सप्ताह में हम गोरखपुर और आसपास के कस्बों में वीडियो कैमरा टीम के साथ घूम रहे थे। मकसद था इंसेफेलाइटिस के मरीजों और अपने परिवारों की कहानी को दर्ज करना। हम जानना चाहते थे कि 1978 से इंसेफेलाइटिस से हजारों बच्चों के मर जाने के बावजूद सरकार चुप क्यों है, इसे राष्टीय आपदा मानकर इसके उन्मूलन का प्रयास क्यों नहीं हो रहा है और क्या इस कारण इस पर चारो ओर चुप्पी है कि इस बीमारी से गरीबों के बच्चे मर रहे हैं?
हमारी टीम भी इन्हीं सब सवालों की खोज में निकली थी।
होलिया में विकलांगतता का अभिशाप
हमारी टैक्सी कैमरा टाइपौड और साउंड उपकरणों से लदी गोरखपुर से 25 किलोमीटर दूर पिपराइच की तरफ जा रही थी। हमें पिपराइच कस्बे से सटे दलितों की अधिसंख्या वाले होलिया गांव पहुंचना था। यह गांव कुशीनगर जिले में आता है। गांव पहुंचते ही इंसेफेलाइटिस के उन्मूलन के लिए कार्य कर रहे चिकित्सक डा आरएन सिंह की संस्था द्वारा लगाया गया एक बड़ा बोर्ड नजर आता है। कैमरामैन के मुफीद फ्रेम के लिए यह बोर्ड बहुत काम का था। कैमरामैन ने गांव को दर्शाने के लिए बोर्ड के साथ धीमा पैन किया। होलिया गांव हमारे मैग्नेटिक टेप में दर्ज हो गया। डा आरएन सिंह के सहयोगी डा लाल बहादुर सिंह हमें बताते हैं कि इस गांव में वे लोग इंसेफेलाइटिस से बचाव के लिए क्या-क्या कर रहे हैं। स्कूल में प्रार्थना के बाद इस रोग से बचाव के बारे में बच्चों को जानकारी दिए जाने की बात सुनकर हम सब कुछ अच्छे दृश्य और साउंड एम्बीयन्स मिलने की उम्मीद में उत्साहित हो गए। हम तुरन्त स्कूल पहुच गए। स्कूल की प्रार्थना खत्म हो चली थी और बच्चे अपनी-अपनी कक्षाओं में व्यस्त थे लेकिन फिल्म टोली के लिए हर चरित्र का रीटेक संभव था। तुरन्त ही कक्षाओं को रोककर फिर से प्रार्थना की रीटेक की तैयारी शुरू की गई।
प्रार्थना के गीतों और राष्टगान की औचारिकता के बाद मास्टर जी ने स्वच्छता की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने यह भी कहा कि बच्चों को अपने बड़े-बूढों को शौच खुले में नहीं बल्कि शौचालय में करना चाहिए के बारे में समझाना चाहिए। मास्टर जी गांव के ही थे और उन्हें पता था कि गांव में अधिकतर लोगों के घर में शौचालय नहीं है फिर भी उन्होंने शौचालयों में शौच जाने की बात कही और बच्चों ने उसे दुहरा भी दिया। हमारी फिल्म के दृश्य में होलिया के मास्टर साहब के यह पूछने पर कि किसे-किसे टीका लगा है सभी बच्चे हाथ उपर खड़ा कर देते हैं लेकिन सच यह है कि बच्चों के एक बार ही टीका लगा है और सम्पूर्ण प्रतिरक्षण के लिए इसका दो बार लगना जरूरी है।
स्कूल से हम एक बार फिर गांव लौटते हैं। हम रामसमुझ सिंह के घर पहुंचते हैं। रामसुझ अब इस दुनिया में नहीं हैं। उनकी पत्नी कुसुम देवी और बेटा मनोज घर चलाते हैं। 2005 के वक्त रामसमुझ की बेटी संजू 13 वर्ष की थी। बीमारी ने संजू की आवाज छीन ली और दिमाग भी। कैमरामैन ने फ्रेम बनाया। फ्रेम में सबसे बाएं बैठी संजू पूरी बातचीत में बुत बनी रही। यह पूछने पर कि आगे चलकर क्या बनना चाहती है तो उसकी खींचकर डा --क् ---ट---र कहना बीमारी के विद्रूप चेहरे को बखूबी समझा रहा था। विद्रूपताएं सिर्फ संजू की विकलांगता से ही नहीं उपजी थीं। थोथी संवेदनओं ने भी कुछ कम इजाफा नहीं किया था। पड़ोस के किसी सम्पन्न व्यक्ति ने संजू की पढ़ाई लिखाई और शादी व्याह का जिम्मा भी लिया था। इस बात को कई लोगों ने कैमरे पर दर्ज हो जाने की नीयत से सुनाया। किसी विकलांग बच्चे पर इतना कुछ करने की मंशा सिर्फ ढोंग नहीं तो क्या था।
हम पासवान टोले में गीता से मिलते है। गीता और ओम प्रकाश का बेटा शैलेष 2005 मेे बीमारी के समय चार वर्ष का था। इस बीमारी ने उसकी आवाज को छीन लिया है और हाथ-पैर भी साामन्य नहीं रह पाए हैं। नाम पूछने पर बहुत मुश्किल से वह समय लगाकर खींचकर शै.......ले .......ष बोलता है। गनीमत है कि उसका दिमाग एकदम दुरूस्त है। जब हम पासवान टोला पहुंचे तब शैलेष बारी (बागीचे) में खेलने गया था। शैलेष की मां गीता पासवान घर चलाती हैं और उनके पति होलिया से 25 किलोमीटर दूर गोरखपुर में चाय का ठेला लगाकर घर का खर्च जुगाड़ता है। पासवान टोले की सभी परिवारों के पास जमीन बीघे में न होकर कट्ठे में है। कैमरा मैन ने शैलेष के आने के इंतजार में माहौल दर्ज करने के लिए महिलाओं के समूह को अपने फ्रेम में समेटना शुरू किया। कभी होलिया गांव से बमुश्किल 45 किमी दूरी पर सरदार नगर में मशहूर चित्रकार अमृता शेरगिल तीन औरतों को अपने कैनवास में उतार रही थीं। होलिया के पासवान टोले की यह औरतें अमृता शेरगिल की तीन औरतों जैसी ही मजबूत दिख रही थीं। किसी के पति सूरत तो किसी के पति मुम्बई कमाने गए हैं। जिस घर के दालान में बैठकर हम उनसे बातचीत कर रहे थे वह पुरूषोें की परछाई से मुक्त था। बातचीत शैलेष की बीमारी और उससे लड़ने के किस्सों तक ही महदूद थीं। जो इस दौरान हमारे मैग्नेटिक टेप में दर्ज न हो सका वह था पासवान टोले की औरतों का अकेलापन। शैलेष के आने के बाद माहौल थोड़ा अगल हुआ। शैलेष की विकलांगता उसकी आंखों से दिखती शरारत पर भारी नहीं पड़ रही थी। हमारे अनुरोध पर शैलेष एक बार फिर बागीचे में अपने दोस्तों के साथ खेलने चला गया। कबड्डी की धमाचैकड़ी में शैलेष को छोड़कर हम होलिया गांव से बाहर निकल रहे थे।

सेमरी महेशपुर-जहां पांच घरों में छह मौते हुईं
गोरखपुर से कुशीरनगर राजमार्ग पर सुकरौली एक उंघता हुआ कस्बा है जिसकी नींद सड़क को फोर लेन करने के लिए हो रही तोड़फोड़ ने तोड़ दी है। सुकरौली से एक रास्ता सेमरी महेशपुर जाता हैै। सेमरी में हमे इंसेफेलाइटिस से हुई मौतों वाले घरों में जाना था। पहला घर जवाहिर ओर दुर्गावती का था। उनका दस बरस का बेटा तारकेश्वर 2005 में इंसेफेलाइटिस की भेंट चढ़ गया। तारकेश्वर के जाने से दुर्गावती की दुनिया ही उजड़ गई। मायूसी से उसे याद करते हुए कहती है-अभी होता तो गबरू जवान होता। कैमरामैन ने एडिटिंग की सुविधा के लिए दुर्गावती को दुबारा से उनकी चाय की दुकान पर बैठा लिया है। जब अंगीठी जलाने का उपक्रम चल रहा है और दुर्गावती के प्रोफाइल वाले शाट दर्ज किए जा रहे हैं। फ्रेम में दुकान की अंगीठी में लगी आग से मनमाफिक वार्म टोन मिल रही थी। दुर्गावती के दिल में लगी आग को बुझाने का तरीका हमारे कैमरे में नहीं था। दुर्गावती के घर के पास ही मुश्किल से 50 मीटर की दूरी पर तारकेश्वर का दोस्त जितेन्दर रहता था। 13 बरस का जितेन्दर, उदयभान और सावि़त्री की आंखों का तारा था। 2005 की बरसात में उसे बुखार आया और फिर दो-तीन दिन बाद उसने असर दिखाना शुरू किया। जैसे-तैसे यादव दम्पति उसे सुकरौली ले गए लेकिन तब तक सब कुछ पलट गया था। 2005 की महामारी के भेंट जितेन्दर भी चढ़ा। दुर्गावती के घर से निकलते ही हमें याद आया कि तारकेश्वर की कोई तस्वीर हमारी बातचीत के दौरान नहीं उतारी गई। इसलिए जितेन्दर के घर बातचीत पूरी होते-होते हमने उसकी तस्वीर मांग ली। तस्वीर मांगना जैसे पुराने जख्मों को फिर से हरा करना था। पहली बार हमें पता चला कि मृत बच्चे की तस्वीर रखने का चलन ग्रामीणों में नहीं हैै। उनका कहना था कि इससे पुरानी यादें धूमिल पड़ती हैं। इसलिए बच्चो की स्मृति पूरी तरह से नष्ट करना ही अपने दुख को कम करने का एक आसान उपाय है। लालचियों की तरह हम तस्वीर की जुगत में लगे रहे। गुमसुम सावि़त्री ने मन मारकर कहीं कोने में दुबकी अपने दुलारे जितेन्दर की एक पासपोर्ट साइल की तस्वीर हमें दे दी। एडिटिंग केे समय किसी भावनात्मक उभार की उम्मीद के साथ वह तस्वीर मेरे पर्स की एक जरूरी हिस्सा बन गई।
गुड्ू शर्मा तीसेक की उम्र के युवा हैं और मजदूरी कर अपना परिवार चलाते हैं। बिना पलस्तर की ंघर की दीवारें उनकी आंशिक बेरोजगारी को सहज ही व्यक्त कर रही थीं। वर्ष 2005 में उनकी और पत्नी सुनीता की गोद में तीन साल का खूबसूरत बेटा सत्यम था। नउकी बीमारी ने यहां भी कहर बरपाया और सत्यम बचाया न जा सका। हमारे अनुरोध करने पर सत्यम का एक ग्रुप फोटो मिल गया जिसमें सत्यम अपने चचेरे भाई बहनों के साथ हाथ में गुलदस्ता लिए हुए है। घने काले घंुघराले वालों बाला सत्यम ऐसा लग रहा था कि मानो तुरन्त ही तस्वीर से बाहर निकलकर हमारे साथ खेलने लगेगा।
मा-बाप के हाथ से छिटककर तस्वीर अब उनके दूसरे बेटे सियम के हाथ में आ गई। अब सियम फिर से हमें तस्वीर में दिख रहे भाई-बहनों के बारे में बता रहा था। फ्रेम से परे सत्यम की मां सुनीता किसी तरह अपने आंसुओं को रोके थी। एकदम अंधेरे में सत्यम की बुआ अपने बिछुड़ गए भतीजे की याद में खो गई थी। मौत की याद में सब कुछ शांत था। हमारा कैमरा अपने पैन से सब कुछ को धीमे धीमे मैग्नेटिक टेप में दर्ज कर रहा था। गुड्डू-सुनीता के पांच बरस के दूसरे बेटे सियम को भी अपने गुजर गए भाई की तरह टीका नहीं लगा है। मै अचानक इस आशंका से घिर गया कि क्या इस परिवार का दूसरा गुलदस्ता भी टूट जाएगा ? यह पूछने का साहस मेरे पास नहीं था क्यांेकि फिल्म टीम टीका न लगने के कारण हुई मौतों की यादों को बखूबी दर्ज कर सकती हैं लेकिन हमारे बूम राड से कोई टीका नहीं लगाया जा सकता।
सियम के काले घंुघराले बालों और शोख चेहरे की याद के साथ हम रामजी गुप्ता के आम के पेड़ के नीचे जमा हो रहे थे। इसी पेड़ के नीचे से पांच सितम्बर 2005 को उनकी प्यारी पोती ज्योति की आखिरी यात्रा निकली। तख्ते पर ज्योति की दादी रामरती और मां बादामी बैठे थे हमारे सवालों के जवाब के लिए। मां का आडियो लेवल काफी नीचा था। जैसे ही ज्योति के बारे में रामरती ने बताना शुरू किया बादामी ने हस्तक्षेप कर अपनी बेटी की यादों को रखना शुरू कर दिया। बेटी की याद ने उसके आडियो लेवल को दुरूस्त कर दिया था। वही सब कुछ ज्योति के साथ हुआ जो दूसरे बच्चों के साथ हुआ। एक दिन अच्छी-भली स्कूल से लौटी ज्योति ने पेट दर्द की शिकायत की। फिर बुखार और दूसरे लक्षण। गोरखपुर के महंगे प्राइवेट नर्सिंग होम में इलाज कराने के बाद जो हाथ में आया वह था डेथ सर्टिफिकेट। हम पता नहीं क्यो इसी डेथ सर्टिफिकेट को तस्वीरें भी विभिन्न कोणों से कैद करते रहे। शायद कहानी को और ज्यादा प्रमाणिक बनाने के लिए या यूं ही सब कुछ दर्ज कर लेने की नीयत से। सभी लोगों की तरह यहां के लोग भी अब किसी पर दोष मढ़ने के लिए तैयार नहीं थे। जवाब वही कि जब जान ही नहीं बची तो हाय तौबा करने से क्या। बातों-बातों में पता चला कि ज्योति की स्मृति शादी के एक वीडियो कैसेट में मौजूद है। जल्दी ही किसी को भेजा गया उसक वीडियो कैसेट की खोज में। इस बीच समय काटने की गरज से गुप्ता परिवार ने दही चूड़ा के नाश्ते का अनुरोध किया। सुबह से धूप में घूम रहा कैमरा टीम ने सहज ही इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। रामजी गुप्ता के दालान में कैमरा टीम दही चूड़ा जीम रही थी। दही गांव के शुद्ध घी को औंटाकर जमाया गया था और चूड़ा स्थानीय चावल से ही तैयार किया गया था। दही चूड़ा के बड़े ग्रास के साथ ज्योति की स्मृति हम सबको मृत्यु भोज का आस्वाद करा रही थी और शायदी इसी वजह से खूब औंटाए गए दूध का दही मीठा न होकर कसैला प्रतीत हो रहा था।
इस कसैले मृत्यु भोज को अभी और कसीला होना था भल्लन के घर पर। सेमरी महेशपुर से एक किलोमीटर दूर पश्चिम पर बरवा टोला है। भल्लन जाति से डोम हैं। 45 वर्ष के भल्लन और 40 की बरफी आठ बच्चों के जनक हैं। 2005 से पहले तक भल्लन सुअर भी पालते थे। इसी से उनका खर्च चलता था। 2005 के जापानी बुखार में सुअरबाड़े को लील गया। सुअरबाड़े का लील लिया जाना तो भल्लन और बरफी किसी तरह बर्दाश्त कर गए लेकिन छह महीने के छोटू और तीन बरस की सोनी की याद को भुलाना बहुत मुश्किल था। पतली नीली प्लास्टिक शीट से बने टैन्ट में किसी तरह का गुजर-बसर कर रहे भल्लन परिवार के लिए अपने बच्चों को नउकी बीमारी से बचा पाना बहुत मुश्किल था। वे भी दूसरे लोगों की नजदीकी अस्पताल की ओर दौड लेकिन सबसे छोटे छोटू और सात भाइयांे की चम्पा ’सोनी’
को वे न बचा सके। बिना छत वाले घर की जिस चैखट पर बैठकर वे टेलीविजन इन्टरव्यू दे रहे थे, जिसमें उनका एक लड़का पूरी तरह से नेमा दिख रहा है, देखकर कोई पूछ ही सकता है कि रत्नगर्भा बरफी अपने बचे हुए छह रत्नों को कैसे बचा पाएगी ? भल्लन परिवार ने हमें सरकारी नुमाइन्दा समझ लिया था। वे बार-बच्चों की मृत्यु का मुआवजा न मिलने की शिकायत करते रहे। हमने भल्लन और बरफी को झूठा दिलासा देकर वहां से विदा ली। वे शायद यह समझ रहे थे कि हमारी रिकार्डिंग से उन्हे मुआवजा मिल जाएगा। जबकि सचाई यह थी कि पैसे की कमी के कारण उनके बच्चे सरकारी अस्पताल की चैखट तक पहुंचकर दर्ज न हुए थे इसलिए मर कर भी वे वे सरकारी दस्तावेजों में मरे नहीं थे। हमारी रिकार्डिंग से क्या किसी परिवार का भला होगा ? क्या सरकार ऐसी चुप्प और गमगीन बातचीत से उद्वेलित हो पाएगी जिसमें मौत का हाहाकार नहीं बल्कि सिर्फ यादें और सूनापन हैं ? पता नही। कैमरे के पैन और उसमे सब कुछ समेट लेने का कौशल, बूम राड और गन माइक का सटीकपन और दुखद स्मृतियों की पुनरावृत्तियां कुछ और बदल सकेंगी तो निश्चय ही बरफी जैसे तमाम रत्नगर्भाओं के रत्न पूर्वांचल के काम आ सकेंगे।
यह सब कुछ सदिच्छा ही है और यह भी कि यह पूरी हो चाहे कुछ कदम ही सही।