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सोमवार, 9 मई 2011

साम्प्रदायिकता पर अन्ना हजारे की समझ अपर्याप्त-राम पुनियानी

आईआईटी मुम्बई में बायोमेडिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर रहे राम पुनियानी वर्ष 1992 से बहुलवादी धर्मनिरपेक्ष जनवादी मूल्यों के प्रचार-प्रसार में सक्रिय हैं। धार्मिक रूढिवाद, साम्प्रदायिकता और आतंकवाद पर उनके व्याख्यान बहुत पंसद किए जाते हैं। आधा दर्जन पुस्तके लिख चुके राम पुनियानी साम्प्रदायिकता पर एक कार्यशाला के सिलसिले में 12 अप्रैल को गोरखपुर में थे। इस मौके पर गोरखपुर न्यूज लाइन ने उनसे बातचीत की। बातचीत के प्रमुख अंश ।

प्रश्न-गुजरात के बाद आप देश में साम्प्रदायिकता की स्थिति को किस तौर पर देखते हैं।
राम पुनियानी- यह लगता है कि चुनावी तौर पर साम्प्रदायिक राजनीति कुछ कमजोर हुई है लेकिन कुछ स्थानों पर यह सत्ताधीन हुई है। साम्प्रदायिकता केवल चुनावी राजनीति में नहीं है बल्कि यह संस्थाओं में अपनी जड़ जमा चुकी है। पुलिस, ब्यूरोक्रेसी आदि में इसकी उपस्थिति बहुत खतरनाक है। इसलिए उपरी तौर पर इस समय साम्प्रदायिकता भले कमजोर दिख रही है लेकिन इसका खतरा कहीं से कम नहीं हुआ है। आतंकवाद के मामलों की जांच प्रक्रिया में हम इसको देख सकते हैं। साम्प्रदायिकता हमारी मानसिकता में पैठ गई है जिसका फायदा उठाने में आरएसएस कभी भी सक्षम है।
प्रश्न- और साम्प्रदायिकता के खिलाफ संघर्ष ?
राम पुनियानी- साम्प्रदायिकता के खिलाफ संघर्ष पहले से ज्यादा संगठनात्मक हुआ है। पहले गिने-चुने संगठन ही इसके खिलाफ संघर्ष कर रहे थे लेकिन छह-सात वर्ष में साम्प्रदायिकता से संघर्ष करने वाले संगठनों में इजाफा हुआ है। कार्यक्रम भी बढ़ रहे हैं लेकिन राजनीतिक दलों पर साम्प्रदायिकता विरोधी आंदोलन का कोई खास प्रभाव नहीं हुआ है। बीजेपी का साम्प्रदायिकता का खुला एजेंडा है लेकिन कांग्रेस नियमित रूप से साम्प्रदायिकता का फायदा लेने की कोशिश करती रहती है। वह अवसरवादी साम्प्रदायिक है। वाम दल साम्प्रदायिकता के खिलाफ संघर्ष में इमानदार हैं लेकिन वह कमजोर होते जा रहे हैं। साम्प्रदायिकता का कारगर विरोध एक बड़ा सामाजिक आंदोलन ही कर सकता है। मै समझता हूं कि सभी आंदोलन साम्प्रदायिकता के खिलाफ संघर्ष को अपने आंदोलन का अनिवार्य हिस्सा माने और साम्प्रदायिकता के खिलाफ चल रहे आंदोलन दूसरे आंदोलनों से एकता बनाएं। तब एक मुकम्मल लड़ाई बनेगी।
प्रश्न-अन्ना हजारे द्वारा मोदी सरकार के बारे में दिए गए बयान के बारे में आपकी क्या राय है।
राम पुनियानी-अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की कितनी भी ताकत हो लेकिन मेरा मानना है कि अन्ना हजारे जी की साम्प्रदायिकता के बारे में समझदारी अपर्याप्त है। उनके द्वारा गुजरात के बारे में दिए गए बयान से मै असहमत हूं और मै इसे दुर्भाग्यपूर्ण मानता हूं। गुजरात में आज भी मुसलमानों, दलितों और महिलाओं की हालत बहुत खराब है। आखिर टाटा की हर नैनो कार पर 60 हजार की सब्सीडी भ्रष्टाचार का सवाल है कि नहीं ? क्या अन्ना जी इन तत्यों से अनजान है या जानना नहीं चाहते ?
प्रश्न- भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का आप क्या भविष्य देखते हैं ?
राम पुनियानी- पता नहीं क्यों मुझे लगता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का फायदा साम्प्रदायिक ताकतें उठा लेंगी। पहले भी वह ऐसा कर चुकी हैं। जेपी आंदोलन और वीपी सिंह के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान मेें साम्प्रदायिक ताकतों ने घुसपैठ बनाई और इस अवसर का फायदा अपने को मजबूत बनाने में किया। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई होनी चाहिए और पूरी ताकत से होनी चाहिए लेकिन साथ ही हमें इसमें साम्प्रदायिक ताकतों के घुसपैठ के प्रति सावधान रहना चाहिए। इस लड़ाई में प्रगतिशील ताकतों की सक्रियता से मुझे भरोसा है कि इतिहास की पुनरावृत्ति नहीं होगी। साथ ही मै इस आंदोलन की दो कमजोरियों को चिन्हित करना चाहूंगा। पहली यह कि इसमें सिर्फ राजनीतिक दलों और राजनेताओं को निशाना बनाया जा रहा है। कार्पोरेट भ्रष्टाचार और कार्पोरेट लूट के बारे में बात नहीं हो रही है जबकि यह सबसे अहम सवाल है। दूसरी यह कि इस आंदोलन में चुने हुए प्रतिनिधियों को किनारे करने की कोशिश की जा रही है। लोकतंत्र में यह कैसे संभव है ? भ्रष्टाचार का सवाल सिस्टम से जुड़ा सवाल है और सिस्टम को बदले बिना इसे खत्म नहीं किया जा सकता।

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