Follow by Email

शुक्रवार, 20 मई 2011

प्रतिरोध का सिनेमा का दो दिवसीय इन्‍दौर फिल्‍मोत्‍सव

मौजूदा दौर में आम बंबईया फिल्मों द्वारा समय व समाज की वास्तविकताओं से
दूर जिस अपसंस्कृति व फूहड़ता को समाज में बड़े पैमाने पर फैलाया जा रहा
है, उसके विरुद्ध भी एक और सिनेमा है जो हमें समाज की हकीकत से रूबरू
कराने का सार्थक प्रयत्न कर रहा है। एक ऐसा सिनेमा जिसमें आज के सुलगते
हुए सवालों को उठाया गया है, जिसके केंद्र में है हाशिये के लोग, उनका
जीवन संघर्ष, समस्याएं और भूमंडलीकरण के दौर में जन्म लेते संवेदनहीनता
के नये स्वरूप। प्रतिरोध का सिनेमा प्रतिबद्ध फिल्मकारों की ऐसी ही
फिल्मों को मंच देने का एक सार्थक प्रयत्न है। जन संस्कृति मंच द्वारा
इलाहाबाद, बरेली , लखनऊ, पटना, गोरखपुर, नैनीताल, भिलाई इत्यादि विभिन्न स्थानों पर गत छः वर्षों में 16 फिल्मोत्सव इसी तर्ज पर सफलतापूर्वक आयोजित किये जा चुके
हैं। सांस्कृतिक एवं सामाजिक सरोकारों को पूर्णत: समर्पित इंदौर की कला
संस्था 'सूत्रधार’ के विशेष अनुरोध पर जन संस्कृति मंच ने म.प्र. में
पहली बार इंदौर में दो दिवसीय प्रतिरोध का सिनेमा फिल्मोत्सव का आयोजन
किया। दिनांक 16 व 17 अप्रैल, 2011 को इंदौर प्रेस क्लब के राजेंद्र माथुर
सभागृह में यह फिल्मोत्सव 'सूत्रधार’ एवं 'जन संस्कृति मंच’ के संयुक्त
तत्वावधान में इंदौर प्रेस क्लब के सहयोग से संपन्न हुआ।
शुभारंभ कार्यक्रम में भूमिका रखते हुए 'सूत्रधार’ के संयोजक सत्यनारायण
व्यास ने फिल्मोत्सव आयोजित करने के उद्देश्य को स्पष्ट किया। 'जन
संस्कृति मंच’ के फ़िल्म समूह द ग्रुप के संयोजक संजय जोशी ने कार्यक्रम की रूपरेखा पर प्रकाश
डालते हुए पूर्व में आयोजित किये गये फिल्मोत्सवों के अनुभवों को दर्शकों
के समक्ष रखा। उन्होंने आशा व्यक्त की कि भविष्य में इंदौर में प्रतिवर्ष
तीन या चार दिवसीय फिल्मोत्सव भी आयोजित किये जा सकेंगे। विशेष अतिथि
सुप्रसिद्ध फिल्म लेखक व समीक्षक श्री बृजभूषण चतुर्वेदी ने इंदौर में
पहली बार आयोजित किये जा रहे समस्यामूलक फिल्मों के इस उत्सव के प्रति
प्रसन्नता व्यक्त करते हुए जानकारी दी कि बंबई, दिल्ली इत्यादि बड़ी
जगहों पर कई वर्षों से डॉक्यूमेंटरी फिल्मों के उत्सव नियमित तौर पर
आयोजित किये जाते हैं, लेकिन इंदौर में 'सूत्रधार’ व 'जन संस्कृति मंच’ ने यह
सार्थक पहल की है। उन्होंने याद दिलाया कि 'सूत्रधार’ ने ही गत वर्ष
दिल्ली के स्वयंसेवी संगठन 'साधो’ के सहयोग से एक काव्य फिल्मोत्सव भी
आयोजित किया था, जिसे देखना एक अद्भुत अनुभव रहा। कार्यक्रम के मुख्य
अतिथि सुप्रसिद्ध फिल्म समीक्षक व फिल्म विधा के पुरोधा श्रीराम
ताम्रकर ने आयोजन पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुये आशा व्यक्त की कि इस तरह
के लीक से हटकर फिल्मों के उत्सव भविष्य में भी आयोजित किये जाते रहेंगे।
इंदौर प्रेस क्लब के अध्यक्ष प्रवीण खारीवाल ने अपने संबोधन में
आश्वस्त किया कि इंदौर प्रेस क्लब भविष्य में भी इस तरह के आयोजन को
पूर्ण सहयोग देता रहेगा।
फिल्मोत्सव का शुभारंभ सुप्रसिद्ध फिल्म निर्देशक संजय काक की फिल्म
‘जश्ने आजादी’ से हुआ। लगभग सवा दो घंटे की यह फिल्म कश्मीर के जनमानस को
अभिव्यक्त करते हुए कई सवाल उठाती है और दर्शकों को उद्वेलित कर देती है।
फिल्म ने सचमुच बड़ी गहमागहमी पैदा की , इसी से जाहिर है कि समाप्ति के बाद
भी दर्शक फिल्म के बारे में और कश्मीर के बारे में और भी संवाद करना
चाहते थे।
दूसरे दिन रविवार 17 अप्रैल को फिल्मोत्सव का प्रारंभ बच्चों के लिए बनाई
गई एक बड़ी प्यारी फ्रेंच फिल्म 'द रेड बलून’ से हुआ। एक बच्चे व लाल
गुब्बारे की मैत्री को बड़े स्वाभाविक व मार्मिक रूप से इस फिल्म में
चित्रित किया गया है। बड़ी संख्या में उपस्थित बच्चों ने फिल्म का भरपूर
आनंद लिया। तत्पश्चात ‘ ओपन-ए-डोर’ सीरिज की छह संवाद रहित लघु फिल्में
प्रदर्शित की गईं। विभिन्न देशों की इन फिल्मों का केंद्रीय तत्व यह
निर्देश था कि एक बंद दरवाजे के खुलते ही पांच मिनट में बच्चे क्या करेंगे
या क्या कर सकते हैं? कई देशों के फिल्मकारों ने इस थीम पर सुंदर फिल्मों
का निर्माण किया, जिनमें से छह फिल्मों को यहां दिखाया गया ।
अगली फिल्‍म संकल्प मेश्राम निर्देशित ‘ छुटकन की महाभारत’ के केंद्रीय पात्र छुटकन के दिवा स्‍वप्‍नों से पैदा हुई हास्‍यास्‍पद स्थितियों ने दर्शकों को लोटपोट कर दिया।
भोजनावकाश के बाद के सत्र में दो एनिमेशन फिल्‍म ‘ ऐ चेयरी टेल’ व ‘नेबर्स’ एवं चार म्यूजिक विडियो फिल्‍म ‘अमेरिका अमेरिका’, ‘गांव छोड़ब नाही’, ‘रिबन्‍स फॉ‍र पीस ’ व ‘ मैंने तुझसे ये कहा’ के अलावा चार लघु फिल्‍में ‘गाड़ी लोहरदगा मेल’, ‘शिट’, ‘प्रिंटेड रेनबो’ और ‘नियामराजा का विलाप’ दिखाई गई। रांची-लोहारदगा के बीच चलने वाली पेसेंजर ट्रेन के अंतिम सफर में
लोकगायकों व कलाकारों द्वारा अभिव्यक्त किये गये उद्गारों को 'गाड़ी लोहरदगा मेल’ में बड़ी
मार्मिकता से फिल्माया गया। 'शिट’ में आजादी के 63 वर्ष बाद भी अपने सिर पर मैला ढोते सफाईकर्मियों की समस्या को उठाया गया है। अकेलेपन से जूझती एक अकेली बूढ़ी औरत व उसकी साथी बिल्‍ली की भावुक कथा ‘प्रिंटेड रेनबो’ में दर्शाई गई है। उड़ीसा में नियागिरी पहाड़ को राज्य सरकार द्वारा एक मल्टीनेशनल कंपनी को बेच दिये जाने पर पैदा हुए पर्यावरण संकट का नियामराजा का मिलाप में हृदयस्पर्शी चित्रण किया गया है।
सायंकालीन अंतिम सत्र सुप्रसिद्ध फिल्मकार आनंद पटवर्धन की सर्वश्रेष्ठ मानी जाने वाली फिल्म- 'राम के नाम’ से प्रारंभ हुआ। सवा घंटे की इस फिल्म में धर्म के नाम पर सांप्रदायिक उन्माद, असहिष्णुता और हिंसा फैलाने वाली कुत्सित राजनीति का भंडाफोड़ करने के साथ ही सच्चाई से रूबरू कराने का प्रयत्न भी किया गया है। समारोह की अंतिम प्रस्तुति दो घंटे की फीचर
फिल्‍म ‘बाएं या दाएं’ थी। फिल्‍मकार बेला नेगी की इस प्रथम फिल्‍म को गंभीर रुचि के फिल्म दर्शकों व समीक्षकों द्वारा पूरे देश में सराहा गया है।
इंदौर फिल्मोत्सव में बेला नेगी स्वयं भी उपस्थित थीं। उन्होंने अपनी इस फिल्म के प्रदर्शन के पूर्व दर्शकों से अपने अनुभव भी सांझे किए। पूर्ण्‍रूप से उत्तराखंड में फिल्माई गई इस फिल्म के निर्माण में आई व्यावहारिक दिक्कतों व कठिनाइयों के बारे में भी उन्होंने काफी जानकारी दी। फिल्म में रमेश नाम के एक सीधे-सादे पहाड़ी युवक की कहानी है जो बंबई की ग्लैमरयुक्त दुनिया से उकताकर अपने गांव लौट आया है और वहीं सादगी और शांति का जीवन व्यतीत करना चाहता है। गांव से जबकि हर व्यक्ति बंबई जाने के सपने दिन-रात देखता है। वहीं इस युवक का गांव में लौट कर आना लोगों को हजम नहीं होता। एक सीधी-सादी कहानी को जितनी भावुकता व शिद्दत से बेला ने फिल्माया है वह देखने से ताल्लुक रखता है। फिल्मोत्सव में उपस्थित
दर्शकों ने भी फिल्म को भरपूर सराहा और फिल्म समाप्ति के पश्चात भी बेला से गुफ्तगू होती रही।
इंदौर फिल्मोत्सव में दो दिनों में कुल 21 फिल्में दिखाई गईं। निश्चित ही दर्शकों के मानस में इस फिल्मोत्सव ने एक अमिट छाप छोड़ी है।
इंदौर के किसी आयोजन में सम्‍भवत: पहली बार दर्शकों से सहयोग करने की अपील की गई। इस वास्ते आयोजन स्थल के बाहर सहयोग के लिए दो डिब्बे रखे गए थे जिनमें लोगों ने प्रतिरोध का सिनेमा की मूल भावना का सम्‍मान करते हुए यथायोग्‍य सहयोग भी किया। हॉल के बाहर गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के सक्रिय कार्यकर्ताओं बैजनाथ मिश्र और गोपाल राय द्वारा संचालित फिल्मों की डीवीडी और पुस्तक प्रदर्शनी ने भी लोगों को आयोजन से जुड़े रहने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सत्यनारायण व्यास
संयोजक, सूत्रधार, इंदौर

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें