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शुक्रवार, 20 मई 2011

अन्ना हजारे का आंदोलन, उसका रूप, उद्देश्य और सार्थकता

प्रो मैनेजर पांडेय, अध्यक्ष जनसंस्कृति मंच
अन्ना हजारे के आंदोलन और अनशन पर जल्दीबाजी में राय बनाना, उसे स्वीकार करना या अस्वीकार करना ठीक नहीं है क्योंकि अन्ना हजारे ने घोषित रूप से जिस समस्या के खिलाफ आंदोलन व अनशन किया था, उस समस्या की गंभीरता, उसको हल करने की जरूरत देश भर के व्यापक जनसमुदाय को महसूस हो रही है और इसी का परिणाम है कि अन्ना के आंदोलन और अनशन को समाज के विभिन्न वर्गों व समुदायों का इतना बड़ा समर्थन मिला। अन्ना हजारे एक गांधीवादी व्यक्ति हैं; उनके व्यक्तित्व, विचार, कार्यशैली में गांधी के विचारों और कार्यशैली का गहरा प्रभााव दिखाई देता है। जैसे स्वंय गांधी के व्यक्तित्व, विचार और कार्यशैली में अनेक अंतर्विरोध थे, इसके बावजूद गांधी स्वाधीनता आंदोलन के सबसे बड़े नेता के रूप में उभरे। गांधीवादी होने के नाते अन्ना के विचारों और कार्यशैलियों में अन्तर्विरोध सभव है लेकिन उन अन्तर्विरोधों के कारण जैसे स्वाधीनता आंदोलन में गांधी की भूमिका का महत्व समाप्त नहीं हो जाता, उसी तरह से अन्ना के विचारों, कार्यशैली में अंतर्विरोध के कारण उनके आंदोलन, अनशन का महत्व कम नहीं होता। मेरी नजर में अन्ना के आंदोलन, अनशन का सबसे बड़ा महत्व तो यही है कि भ्रष्टाचार का मुद्दा पूरे भारतीय समाज के सामने अपनी सारी जटिलताओं के साथ उजागर हुआ और भ्रष्टाचार को खत्म करने की व्यापक चिंता हर तबके के लोगों के मन में पैदा हुई। यह कोई आज के दौर के भारतीय राजनीति, समााजिक, आर्थिक परिस्थिति में छोटी बात नहीं है।
अन्ना हजारे के आंदोलन के पीछे कौन लोग थे, आंदोलन का उद्ेश्य क्या है, अन्ना व उनके साथी जिस लोकपाल बिल और लोकपाल नाम की संस्था की बात कर रहे हैं, उसका स्वरूप क्या है, क्या होना चाहिए, यह सभी बातें विचारणीय हैं और इस पर बहस भी होनी चाहिए। देखिए, अन्ना के आंदोलन का समर्थन करने वाले दो तरह के लोग थे-एक जो खुले रूप से आंदोलन के साथ थे। कुछ ऐसे लोग भी हो सकते हैं जो छिपे तौर पर अन्ना का समर्थन कर रहे हैं। ऐसे लोगों पर अधिक बात करना मुश्किल है क्योंकि केवल अनुमान में वास्तविकता से ज्यादा अनुमान करने वाले के इरादे की अभिव्यक्ति होती है। जहां तक खुले रूप से समर्थन करने वालों में एक न्यायाधीश जो कर्नाटक की सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ काम कर रहे हैं, एक वकील जो लोकतांत्रिक अधिकारों व मानवाधिकार के हनन के विरूद्ध मुकदमे लड़ा करते हैं, एक आर्यसमाजी स्वामी जो माओवादियों तक के समर्थन में रहने के कारण बहुत लोगों के आंखों की किरकिरी बने हुए हैं। मै हेगड़े, प्रशांत भूषण, अग्निवेश की बात कर रहा हूं। इस आंदोलन का समर्थन करने वालों में वंदना शिवा भी थीं। यही नहीं मै जिस दिन जंतर-मंतर पर उपस्थित था, मुस्लिम समुदाय के एक बड़े नेता जो कई संस्थााओं के अध्यक्ष हैं, उन्होंने अपने समुदाय की ओर से अन्ना हजारे के आंदोलन और उसके उद्देश्यों का समर्थन किया। एक तरफ आंदोलन का इतना व्यापक तबकों का समर्थन था तो दूसरी ओर आंदोलन का विरोध करने वाले कौन लोग थे ? मेरी जानकारी में आंदोलन का विरोध करने में दो व्यक्ति खास तौर पर सामने आए थे-कांग्रेस के दिग्विजय सिंह और दूसरे अमर सिंह। इन दोनों की भारतीय राजनीति और भारतीय समाज में कितनी साख व कैसी छवि है, इससे सब परिचित हैं। मै तो यह कहूंगा कि अमर सिंह जिस चीज का विरोध करें उसमें कुछ न कुछ अच्छाई जरूर होगी, इसका अनुमान किया जा सकता है।
अन्ना हजारे के कुछ बयानों के कारण थोड़ी गलतफहमियां पैदा हुईं। एक तो उन्होंने नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा की। इससे कुछ दुखी और नाराज हुए। यह दुख व नाराजगी समझ में आने लायक है और जायज भी है पर बाद में अन्ना ने जो सफाई दी, उस पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। मै इस प्रसंग में एक बात और कहूंगा। अपने देश में हर आंदोलन के विचार और व्यवहार में साजिश सूंघने और खोजने की कुछ लोगों की आदत है जिसको वह कभी-कभी क्रांतिकारी दृष्टिकोण के रूप में भी जाहिर करते हैं। बहुत पहले काल माक्र्स ने पेरिस कम्यून की घटना पर दो साक्षात्कार दिए थे जिसका मैने हिन्दी में अनुवाद किया था जो मेरी किताब संकट के बावजूुद में है। इसमें से एक साक्षात्कार में काल माक्र्स ने कहा था कि क्रांति केवल एक पार्टी ही नहीं करती पूरा देश और समाज करता है। अन्ना हजारे व्यक्तिगत रूप से कोई क्रांतिकारी व्यक्तित्व नहीं है। उनका आंदोलन, अभियान भी क्रांतिकारी नहीं है लेकिन पूरे देश-समाज को क्रांतिकारी बनाने के लिए जो पहला कदम जरूरी है, वह है किसी ऐसी बड़ी समस्या के रूप में देश की जनता को जगाने और आन्दोलित करने का काम, अन्ना हजारे के माध्यम से हुआ।
भ्रष्टाचार का गहरा रिश्ता पूंजीवाद से है। अपने जन्म से ही पूंजीवाद झूठ और लूट की व्यवस्था रही है। आज उसके झूठ और लूट का अनंत विस्तार हुआ है। इसलिए सचमुच इस देश से भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए पूंजीवाद के विरूद्ध व्यापक जागरण और आंदोलन की जरूरत है। मुझे चिंता के साथ अफसोस है कि इस दिशा में काम करने के बदले जनजागरण का पहला कदम जो हजारे ने उठाया है, उस कदम की आलोचना और निंदा करने में कुछ लोग लगे हुए हैं। मै तो यह भी कहूंगा कि हजारे और उनके सहयोगी जिस लोकपाल बिल, विधेयक की बात कर रहे हैं, उसके स्वरूप पर और लोकपाल की नियुक्ति की शर्तों पर गंभीरता से विचार होना चाहिए और प्रस्तावित मसौदे की कमियांे को सामने लाने, लोकपाल विधेयक को मजबूत, कारगर और परदर्शी बनाने की दिशा में अपनी बुद्धि का उपयोग करना चाहिए। केवल उस आंदोलन की निंदा में नहीं रहना चाहिए। प्रस्तावित विधेयक में यह बात है कि लोकपाल की नियुक्त में भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत या भारत रत्न प्राप्त लोगों की सलाह ली जानी चाीिहए। भारत सरकार या कोई भी सरकार कैसे लोगों को पुरस्कृत और सम्मानित करती है, सब जानते हैं। इसलिए केवल भारत रत्न प्राप्त करना, लोकपाल नियुक्ति में सलाह देने की पर्याप्त योग्यता नहीं हो सकती है। लता मंगेशकर भारत रत्न प्राप्त हैं, उनके गायन के हम उनका सम्मान करते हैं लेकिन लोकपाल की नियुक्ति में उनकी उपयोगी भूमिका हो सकती है, मुझे नहीं लगता। भारत मूल के जिन लोगों को नोबेल, मैग्सेसे पुरस्कार मिला है, उन लोगों की भी सलाह लेनी की बात कही गई है। मुझे इस प्रसंग में पहली आपत्ति तो यही है कि इन लोगों को पुरस्कार कानून बनाने या लोकपाल की नियुक्ति करने की योग्यता के लिए नहीं मिला है बल्कि साहित्य, कला, संस्कृति, विज्ञान आदि में योगदान के लिए मिला है। इसलिए जिन काराणों से उनको पुरस्कार मिला है, उसी में उनकी सलाह को कोई अर्थ है। कुल मिलाकर लोकपाल विधेयक और लोकपाल की नियुक्ति के सम्बन्ध मंे जो बातें सामने आ रही हैं, उससे जाहिर है उन्ही से सलाह ली जाएगी जो देश के सम्पन्न, सभ्रान्त अभिजन है जबकि भ्रष्टाचार की मार का सबसे अधिक शिकार आम आदमी है। क्या लोकपाल बिल के बनाने में भारत के किसानों, मजदूरों, अल्पसंख्यकों, स्त्रियों, दलितों आदि की भी कोई भूमिका, आवाज होगी ? इन बातों पर ध्यान देने व जोर देने की जरूरत है न कि अपनी संतुष्टि के लिए बाल की खाल निकालने की प्रक्रिया में लगे रहने की। शुद्धतावाद और आत्ममुग्धता से न कोई जनजागरण होता है न सामाजिक आंदोलन या सामाजिक परिवर्तन होता है। मै तो अंत में यह भी कहूंगा कि अभी हमारे देश में सच्चे लोकतंत्र की रक्षा करने का सवाल सबसे बड़ा सवाल है और सच्चे लोकतंत्र का एक मात्र दुश्मन है राजनीति में भ्रष्टाचार की संस्कृति। सच्चे लोकतंत्र की रक्षा के बाद ही समाजवाद को ले आने की कोई संभावना बन सकती है।
इस आंदोलन को माीडिया द्वारा बहुत हाइप दिए जाने के सवाल पर मेरा कहना है कि प्रिंट मीडिया की तुलना में इलेक्टानिक मीडिया ने इससे अधिक कवरेज दिया। इलेक्टनिक मीडिया के लिए कोई भी सनसनीखेज मामला अधिक आकर्षक होता है, अब उसमें विचार-विश्लेषण की संभावना खत्म हो गई है। समर्थन करने वाले लोगों को व्यक्तिगत जानकारी के आधाार पर और जो आंखों से देखा उसमें सात साल के बच्चों से लेकर 77 साल के बूढे थे। इसमें छात्र-छात्राएं, वैज्ञानिक, साहित्यकार, अध्यापक थे। मध्य वर्ग के लोग थे, कुछ राजनीतिक नेता थे, फिल्मी दुनिया के भी कुद लोग थे। ये सब के सब केवल मनोरंजन की तलाश में दिल्ली की सड़कों पर घूमने वाले मघ्य वर्ग के लोग नहीं थे। रही बात देश के पैमाने पर शहरों से जो सूचनाएं मिली है कि अनेक वर्गों के लोग समर्थन कर रहे थे। आप यह कह सकते हैं कि मजदूर और उनके संगठन दिल्ली में नहीं थे तो यह मजदूरों को संगठित करने और उनका आंदोलन चलाने वालों का दायित्व था कि मजदूरों की आवाज भ्रष्टाचार के खिलाफ समाज के सामने आए। वैसे इस आंदोलन का विरोध करने वाले जो लोग हैं, वे क्या किसान-मजदूर हैं या मध्य वर्ग के आत्ममुग्ध बुद्धिजीवी हैं या भ्रष्टाचार के दलदल में फंसे राजनीतिक दल के नेता।
इस आंदोलन को केवल अन्ना हजारे और उनके पक्ष में सक्रिय पांच-दस लोगों पर छोड़कर इस देश के जागरूक लोगों, बुद्धिजीवियों, देशभक्तों, इमानदार राजनीतिज्ञों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को बैठ नहीं जाना चाहिए। दूसरे के आन्दोलनों की आलोचना व निन्दा करने से बेहतर है कि स्वंय उन आन्दोलनों को सही दिशा देने के लिए सक्रिय होना या नया आन्दोलन खड़ा करना। सबसे पहला और आखिरी सवाल है कि भ्रष्टाचार इस देश की राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक संवेदनशीलता, सांस्कृतिक चेतना के लिए कैंसर की तरह खतरनाक है या नहीं ? यदि है तो उससे लड़ने के लिए विभिन्न तरीकों से लगना चाहिए जो अन्ना हजारे से सहमत हैं या नहीं सहमत हैं।

-समकालीन जनमत से साभार

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