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बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

गोरखपुर फिल्म सोसाइटी का कार्यक्रम-प्रदीप सुविज्ञ की काव्य फिल्म आधी दुनिया प्रदर्शन







गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के तत्वावधान में 20 फरवरी को प्रेस क्लब सभागार में फिल्मकार प्रदीप सुविज्ञ की काव्य फिल्म आधी दुनिया दिखाई गई। इस फिल्म को देखने के लिए बड़ी संख्या में साहित्यकार, रंगकर्मी व सामाजिक कार्यकर्ता आए।
आठ कवियों प्रो परमानंद श्रीवास्वत (दक्षा पटेल) , प्रो विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ( उड़ गई मां), महेश अश्क ( उसने देखी फिर अपनी फटी साड़ी), सुरेन्द्र काले (संजना सोमेश), देवेन्द्र कुमार आय (सुन्दर हो तुम) , प्रमोद कुमार (कल तुम होगी और करीब), डा रंजना जायसवाल ( जी चाहता है) और वशिष्ठ अनूप (खूश्बू का बंधन) की रचनाओं पर आधारित इस फिल्म में औरतों की दुनिया के दुख-दर्द की अभिव्यक्ति हुई है। आधे घंटे की इस फिल्म के प्रदर्शन के बाद हुई चर्चा में भाग लेते हुए वरिष्ठ कवि महेश अश्क ने कहा कि प्रदीप सुविज्ञ ने इस फिल्म में कविता की आत्मा को समझा है। यह फिल्म हमारे जीवन में औरतों की भूमिका को परिभाषित करते हुए एक नए अनुभव को विस्तार देती है। उन्होंने कहा कि फिल्म में उनकी जिस गजल को लिया गया है वह उन्होंने करीब 30 वर्ष पहले लिखी थी। तब उर्दू-हिन्दी में जिंदगी को शब्दों में व्यक्त करने की चुनौती थी। फिल्म में उनकी रचना की संवेदनात्मक धरातल को बेहतर तरीके से व्यक्त किया है। डा रंजना जायसवाल ने फिल्म में अपनी कविता की अंतिम पंक्तियों के विजुअल एक्सप्रेशन पर असहमति जताई और कहा कि कविता का मर्म ठीक से अभिव्यक्त नहीं हो पाया है। कथाकार मदन मोहन ने रचनाकार की असहमति को स्वीकार करने पर जोर देते हुए कहा कि यह एक बड़ी चुनौती है कि कवि संवेदना के जिस धरातल पर शब्द देता है उसे कोई दूसरा माध्यम कैसे अभिव्यक्ति करे। उन्होंने इस काव्य फिल्म के बनने और उसके प्रदर्शन को शहर के लिए एक घटना बताया। युवा आलोचक प्रो अनिल राय ने कहा कि शाब्दिक संरचना को दृश्य संरचना में रूपान्तरित करने के दौरान एक तरह से रचना की पुनप्र्रस्तुति होती है। कवि प्रमोद कुमार ने कहा कि फिल्म के दृश्य विम्बो की सराहना की। वरिष्ठ कवि एवं आलोचक प्रो परमान्द श्रीवास्तव ने दक्षा पटेल कविता की पृष्ठिभूमि की चर्चा करते हुए कहा कि फिल्म ने कविता को बड़ा अर्थ दिया है। इस मौके पर प्रो विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की अनुपस्थिति में फिल्म पर उनकी टिप्पणी पढ़ी गई जिसमें उन्होंने कहा है कि शब्द अपना मूल रूप जिस अर्थ में ग्रहण करते हैं वह दृश्य ही होता है। शब्द अततः संकेत ही होते हैं, अर्थ तो पदार्थ ही है। प्रदीप सुविज्ञ ने पद को पदार्थ देने का प्रयत्न किया है।
फिल्मकार प्रदीप सुविज्ञ ने फिल्म निर्माण के दौरान हुए अनुभवों को साझा किया और फिल्म में अभिनय करने वाले कलाकारों वंदना दास, भावना सिह, सपना सिंह, रीता श्रीवास्तव, रतना सिन्हा, राजेश पांडेय, मानवेन्द्र त्रिपाठी, सौम्या वाई कृष्णमूर्ति, गगनदीप आर्य, कविता आर्य, राजेश राज, रवीन्द्र रंगधर, सुशील सिंह, डेजी सिराफिन, मास्टर गीत, कैमरामैन राजेश रणजीत, संगीत निर्देशक केके सिंह, सम्पादन करने वाले तारिक खान का परिचय कराया। फिल्म में कविता पाठ सुकृति अस्थाना और प्रदीप सुविज्ञ का था। इस अवसर पर डा चन्द्रभूषण अंकुर, अमोल राय, मनीष चैबे, गोपाल राय, आईएच सिद्दीकी, नितिन अग्रवाल, डा मुमताज खान, आशीष, अशोक चैधरी आदि उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के संयोजक मनोज कुमार सिंह ने किया।






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3 टिप्‍पणियां:

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